मैंने झूठ कहा था कि मैं तुम्हे चाँद में देखता हूँ,हर पल चंचल, धब्बो भरा चाँद,
रात भर बादलो की ओट मे ख़रा चाँद,
सूरज की स्वर्णिम किरणें चुराता चाँद,
दिन में डर कर चेहरा छुपाता चाँद,
उस चाँद मे तुम कैसे दिख सकती हो.
मैंने झूठ कहा था कि मैं तुम्हे नदियो मे देखता हूँ,
शहरो के किनारो से गुज़रती काली गंदी नदिया,
बाढ़ की समस्याएं खड़ी करती अंधी नदिया,
अपने अंदर मनुष्य को लीलने वाली नरभक्षी नदिया,
सभ्यताओ के उत्थान पतन की साक्षी नदिया,
उन नदियो मे तुम कैसे दिख सकती हो.
मैंने झूठ कहा था कि मैं तुम्हे पर्वतो मे देखता हूँ,
ये काले कलुटे नुकीले पर्वत,
बादलो का रास्ता रोके हठीले पर्वत,
अपनी उँचाई के घमंड से चूर पर्वत,
आम जन के पहुँच से दूर पर्वत,
उन पर्वतो मे तुम कैसे दिख सकती हो.
मैंने झूठ कहा था कि मैं तुम्हे फूलों मे देखता हूँ,
ख़ुद की ख़ूबसूरती पर इतराते फूल,
काँटो का रस चूस उन्हे सुखाते फूल,
भौंड़ों को मतवाला बना उन्हे बहकाते फूल,
फिर ख़ुद सूख कर झड़ जाते फूल,
उन फूलों मे तुम कैसे दिख सकती हो.
मैंने झूठ कहा था कि मैं तुम्हे सूरज की किरणो मे देखता हूँ,
सोते मनुष्य के सपनो को तोड़्ती सूरज की किरणे,
आँधियारे से मुँह मोड़्ती सूरज की किरणे,
नदियो तालाबो को सुखाती सूरज की किरणे,
तन मन मे प्यास जगाती सूरज की किरणे,
उन किरणो मे तुम कैसे हो सकती हो.
तुम भी निड़ी भोली हो, मेरी हर बात मान लेती हो,
बिना सोचे समझे कुछ भी, क्यो हर शब्द पर जान देती हो,
ज़रा सोचो ख़ुद भी तुम, इन भौतिक चीज़ो मे कैसे हो सकती हो,
जब तुम मन के अंदर हो, तो बाहर कैसे दिख सकती हो.

1 comment:
इन भौतिक चीज़ो मे कैसे हो सकती हो,
जब तुम मन के अंदर हो, तो बाहर कैसे दिख सकती हो.
XCELLENT!! bahut khubsurat!
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