Monday, November 26, 2007

पर परवाना जलता है

संयोग बस कल रात घर कि,
खुलि रह गई खिड़कियां,
और नींद इतनि तेज आई,
मै बुझा ना सका बत्तियां.

इस छोटे से गलती का,
परिणाम इतना विक्राल हुआ,
लुटा एक और परवाना,
मिर्त्यु उसका भी अकाल हुआ.

आया था सपने लिये हुए,
रस-राग रंग हरियालि कि,
तरुनाइ से भरे जीवन कि,
और मादक खुशहालि कि.

गुन्जा वह इतने जोरो से,
मै अपना निन्द भुला बैठा,
और वो पागल भंवरा,
अपने प्रितम को गले लग बैठा.

देख कर उसकि दीन दशा,
मन हि मन मै हर्षाया,
सस्ता सा एक नया बलि,
हे इश्वर तुमने फिर से पाया.

सत्य है यह अद्भुत अचरज,
परवाना भी यह जानता है,
शमा उसे नहि मिल सकती,
पर हार कहाँ वो मानता है.

करता रहता तब तक प्रयत्न,
जब तक जीवन चलता है,
और शमा के शीतल आंच मे,
वो हर पल हीं जलता है.

जीवन क्रम चलता है,
यों ही परवाना जलता है,
शमा सोचती व्यर्थ विकल है,
यह इसकि चंचलता है,
पर परवाना जलता है.

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