Thursday, November 29, 2007

मैं हर पल तुम्हे देखता हूँ!

मैने नदियाँ देखी है,
लहराती बलखाती इठलाती नदियाँ,
कल-कल कर बहती शर्माती नदियाँ,
किनारे के मर्यादाओं को मानती नदियाँ,
प्यासे पथिक के भावनाओ को जानती नदियाँ,
उन नदियों मे तुम्हे देखता हूँ.

मैने पर्वतो को देखा है,
गौरवोन्मत् अटल अडिग पर्वत,
शैलभ शलोने सजल पर्वत,
वर्फीलि चादर ओढे धवल पर्वत,
नीले गगन से मिलने को विकल पर्वत,
उन पर्वतो मे तुम्हे देखता हूँ.

मैने फूलो को देख है,
सुन्दर स्नेहिल शर्मीले फूल,
मोहक मादक मनभावन फूल,
जीवन कि खुशियाँ लूटाते फूल,
भंवड़ों के गुंजन मे खुद लुट जाते फूल,
उन फूलों मे तुम्हे देखता हूँ.

मैने सूरज कि किरणें देखि है,
नित्य सवेरे अन्धेरे से लड़ती सूरज कि किरणें,
अपने लालिमा से जीवन कि लालि भरती सूरज कि किरणें,
मुस्कुराति हर किसी को गले से लगाती सूरज कि किरणें,
मन मे आशाओं कि ज्योति जगाति सूरज कि किरणें,
उन सूरज कि किरणें मे तुम्हे देखता हूँ.

मैने चांद को देखा है,
रात मे बाद्लो से लुका छिपी खेलता चांद,
प्रतिपल अपना अमृत रस उड़ेलता चांद,
दुख मे भी सुख का झलक दिखाता चांद,
जीवन जीने कि सारी कला सिखाता चांद,
उस चांद मे तुम्हे देखता हूँ.

मैने पथिक कि आंखे देखी है,
हर क्षण यादों मे खोई आंखे,
उल्लासित् जीवन के सपने संजोई आंखे,
उर्जा से भरी विकल आंखे,
कुछ कहती भोली सरल आंखे,
उन आंखो में तुम्हे देखता हूँ.

मैने तुम्हें देखा है,
कल कल करती नदि कि धारा तुम,
सूरज कि किरणे, भंवड़ो का सहारा तुम,
चंदा के चांदनी कि अमृत वर्षा तुम,
शैलों सी सजल, पथिक कि उर्जा तुम,
सच कहूँ, मैं हर पल तुम्हे देखता हूँ.

2 comments:

Unknown said...

Kissi ke prati apne prem ko prakat karne ka adbhut aur anokha andaaz hai is kavita mein.

Unknown said...

Kissi ke prati apne prem ko prakat karne ka adbhut aur anokha andaaz hai is kavita mein.