Wednesday, November 28, 2007

कर्ण और केशव...

सब शांत पड़ा है कोलाहल, है जीवन का पल ये रूका हुआ,
निरुपाय खड़ा है अजेय कर्ण,रथ - चक्र जमीं मे धंसा हुआ.

है देख रहे सब जन रुक कर,ठहड़ा है समय, कह रहा संजय,
है सोच मे पार्थ भी डूबा हुआ,ललकार रहे है उसे धनंजय.

मौक़ा नही यह फिर आने वाला,रणभूमि मे नही करते विचार,
है खड़ा शत्रु असहाय भूमि पर,शर से उसका कर दे संहार.

कह रहा पार्थ, नही केशव,क्या यह वीरो का बदला होगा,
कल जीत अगर भी जाएँगे हम,सिर पर छल का सेहरा होगा.

इस कायरतम कार्य के बाद,फिर कहाँ मूँह दिखाने जाएँगे,
जब परलोक की बारी आएगी,गुरु द्रोण को क्या बतलाएँगे.

यह सुन केशव का चेहरा,क्षण भर को तो मुस्काया,
उस रंगमंच की कठपुतली के,आवेग पर मन मे दया आया.

बोले केशव हे पार्थ सुनो,यह नही नीच कायरता है,
कायरता क्या है इन से सिखो,जब सात एक से लड़ता है.

क्या दोष था तेरे अभिमन्यु का,जिसने इसी भूमि मे प्राण गँवाया है,
और इस सूत कर्ण के वाणो से,छलनी हो मिर्त्यु को पाया है.

ग़लती क्या इन लाखो आर्यो का है, जो रण मे यो जीवन देते है,
घर पर जिनके बीबी बच्चे,ख़ून के आँसू रोते है.

ग़लती क्या उस द्रोपदी की थी,जिसकी लाज इन्होने लूटी थी,
यह वही कर्ण है ख़रा आज,जिसके समक्ष मर्यादाएं टूटी थी.

सोच और ना पार्थ आज,फ़ैसला आज तेरे हाथो मे है,
एक कर्ण के मरने से,बचता सुहाग लाखो मे है.

यह युद्ध यही हो रहा ख़त्म,फिर बस पूर्णाहुती रह जाएगी,
जिसने है जैसा कर्म किया,समय - चक्र उसे वही गति दिखलाएगी.

सब सुन अर्जुन ने फिर मन से,हर संशय का समाधान किया,
आँखों मे लज़्जा लिए झुका मस्तक,शर का प्रत्यंचा पर संधान किया.

सब देख सर्वज्ञ दानवीर कर्ण,मन ही मन हँसा और मौन रहा,
जीवन की थी अंतिम वो घड़ी,पर मन मे था उसे संतोष बड़ा.

केशव के हर दोषारोपण का,दे सकता था उस पल उत्तर,
उस वक़्त कहा थे वो केशव,जब भीष्म का शैया बना था शर.

फिर द्रोपदी के उस हालत का भी,क्या दुशासन असली दोषी था,
दोषी था मूक वह धर्मराज,धुत मे रखा जिसने उसे बलि पर था.

उस से बढ़ कर वह द्रुपद पुत्री,पांचाली की थी जिसकी काया,
अंधे का पुत्र है बड़ा अंधा,यह कहना उसे कैसे भाया.

फिर जीवन का क्या लेखा जोखा,जो जन्म लिया उसे मरना है,
दोषी था कौन, था दोष किसका,कह कर किसे क्या सावित करना है.

बस कोषा उसने उस दिन को जब,एक कुमारी ने था उसे जन्म दिया,
उस माँ की ग़लती ने उसका,जीने का हर हक़ छीन लिया.

वरना कमी क्या थी कौंतेय् मे,जो वह यों राधेय् कहलाया,
पराक्रर्मी परषु सा गुरु पा कर भी,क्यो हो गयी यो शापित काया.

फिर नर की होती अंतिम इच्छा,बस स्वाभिमान से जीने की,
इस हित उसने क्या कवच-कुंडल,निज जीवन तक की भिक्षा दी.

फिर आज जब बारी आई है, रण मे दुर्योधन हित लड़ने की,
मित्रता की रहने दो लाज केशव,ले लो मेरी भी आहुति.

हो गया कर्ण फिर खड़ा ठोक,छाती उस शर को खाने को,
रथ-चक्र की अब कहा बात रही,जीवन-चक्र ही जब है जाने को.

अर्जुन के उस शापित शर ने,फिर मस्तक का संधान किया,
कट गिरा वीर वह भूमि पर,ज्यो सैकड़ों सूरज संग अस्त हुआ.

यो ख़त्म हुआ एक बड़ा कंटक,युद्धिष्ठिर यह सुन बहुत हर्षाए,
सस्नेह बंधु के गले मिले,जीवन दान के बोझ से थे उबर पाए.

बस हारा था आज मन से अर्जुन,जिसने कायरता को कर्तव्या गति माना था,
जीत कर भी यो हरेगा वो,आज पहली बार तो उसने जाना था.

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