दरिया का सूना किनारा, संध्या कि निस्तब्ध धारा,
मौन है ज्यो अजनबी है,
शांत गुमसुम बह रही है.
कहाँ छुपी वो उफ़नाती धारा,
कहाँ है वो चंचल किनारा,
कल तक जो संग खेलते थे,
मधुर संगीत से जो बोलते थे.
आज फिर क्यो शांत है सब,
माना बीता सावन था तब,
उफ़नाई दरिया हुंकारती थी,
किनारे तोरना वह जानती थी.
सागर मे ज्यो शैलाब सा था,
नाविक से ज्यो टकराव सा था,
विकराल हो उसे फ़ैलना था,
सरल उत्साह से सब देखना था.
सब ने उसे सराहा था तब,
उसने भी कुछ पाना चाहा था तब,
पर समझ ना पाया उस आवेग को वह,
चंदा की शीतल तेज को वह.
चंदा जो सूरज सी नही है,
खुद कि कहाँ उसे रोशनी है,
स्व तेज को वह आश्रिता है,
सब भांति कहाँ उसे स्वतंत्रता है.
जब तक कि वह समझ पाता,
चंदा का चितवन चुराता,
कालि अमावस आ चुकि थी,
और पुर्णिमा कि सर्वस्व चंदा,
निरव अंधकार मे जा चुकि थी.
तब से दरिया शांत है फिर,
उदास, स्थिर, मौन गम्भिर,
चंदा के ही इंतजार मे है,
बदला बदला व्यव्हार मे है.
आज संध्या के समय भी,
शांत गुमसुम बह रहा है,
फिर दिखेगी एक बार चंदा,
मन हि मन यह कह रहा है.
काश कि चंदा समझती,
शीतल किरण ले फिर उतरती,
बस एक बार सब समझा जाती,
आवेग मन का बुझा जाती.
पर नहि ये हो सकेगा,
दरिया चुप-चुप हीं बहेगा,
लौट आओ एक बार चंदा,
हर पल बस वह यहि कहेगा.
और चंदा दूर उससे,
बादलो मे छुप कर हंसेगी,
उठो बन कर दिखाओ सागर,
तब तक नही चंदा दिखेगी.
क्या कभी ये हो सकेगा,
दरिया क्या सागर बनेगा,
मर्यादित तट को छोड़ कर वह,
अगम जल मे मिल सकेगा.
सब संभव भविष्य के गर्त मे है,
अखंड आर्यावर्त मे है,
ये पंक्तिया सब कह सकेंगी,
इतिहास सुलझाये बिना नही रह सकेगी.
यह युद्ध समय से चलता रहेगा,
पल पल जीवन बदलता रहेगा,
स्नेह सींचित पंथ पर,
पथिक अविचल बढता रहेगा.

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