सूरज कि किरणे अभी जगी नही,फिर तेरे नैना क्यों चंचल,
दूर बहुत है रंगो कि बदरी,
फिर मन मे यह कैसा हलचल.
सिमटी तु नीली चादर मे,
जैसे सिमटा मासुम सवेरा,
अल्हड़ सी मस्त अदाओं ने,
डाला तुझ पर यह कैसा डेरा.
वासंति कोयल के ये करलव,
क्यो तन मन तेरे जगा रहे है,
रोम रोम मे सिमटी चंचलता,
क्यो मंद मदिर मुस्का से रहे है.
सागर से शांत मृदुल हृदय मे,
यह ज्वार कहाँ से आया है,
होली के इस पावन दिन मे,
क्या मेघों ने रंग बर्षाया है.
मुखड़े से खिलती ऐसी लाली,
जैसे कमल सुबह का खिलता है,
अधड़ो की तरुनाई मे सिमटी,
गुलाबी पंखुड़ियो की कोमलता है.
सीपी से श्वेत सुन्यनों मे,
सिमटे दो नभ के तारे है,
भवों की तीखी सी रेखा मे,
काजल लिपटी दो कटारे है.
केशों के ये बिखड़े लट हैं,
या काले घुंघराले बादल है,
मादक व्यार के झोके है,
या लहराते तेरे आंचल है.
गुस्से मे सूरज कि लाली,
सोते मे स्वर्णिम चंदा हो,
हंसती तो बिजुड़ी सी दिखती,
जैसे स्नेह कि पावन गंगा हो.
उस पर इन नाजुक अदाओ ने,
चहुँ ओर रंग बिखड़ाया है,
सिमटा हर रंग तुम्हारे चितवन मे,
कस्तुरि कि कंचन काया है.
रंगो से तेरा कुछ बचा नही,
मै और भला क्या कर पाऊंगा,
पहली होली के प्रथम प्रहड़ को,
कल याद मे कैसे लाऊंगा.
शरारत कह लो, या शर्माओ,
होठों कि हँसी चुराऊँगा,
तन भले रंगा हो जीवन ने,
पर मन को मै रंग जाऊँगा.

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