देखो ना तुम्हारे बिना, ये फूल आज मुरझा से गए है, पत्तो का रंग है बेरंग, काँटे तक सकुचा से गए है,
बहती ब्यारों की खुशबु मे क्यो, यों रूठने की बू आ रही है,
मासूम से मौसम मे अचानक, ये कैसी मायूसी छा रही है.
दीपक की ये रोशनी, क्यो आज झिल्मिल हो रही है,
हवा के एक झोके से बस, क्यो आस लौ कि खो रही है,
तिमिर के प्रसार से क्यो, मन आज इसका काँपता है,
संबल जो था दूसरो का, क्यो आज बगले झाँकता है.
सपनो का सुहाना घरौंदा, पल मे जैसे ढह सा गया है,
मन की उमंगो का दीपक, जल मे जैसे बह सा गया है,
सुहानी यादों का हर नज़्म, बस गीत यह एक गा रहा है,
लौट आओ ना फिर एक बार, कोई हर पल तुझे बुला रहा है.

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