Tuesday, November 27, 2007

थप्पड़...


सारे शहर कि गंदगी,
उस गन्दे नाले से होती हुई,
पास के नदि मे मिलती थी,
जिसके किनारे उसने,
बाँस कि तीन-चार कमानियों पे,
अपना आसियाना टिका रखा था.

और सवेरे सवेरे अपने दुलारे,
सांवले नट्खट मुन्ने को,
उस पानी से नहलाते हुए भी,
उसकि आंखो मे एक संतोष झलक रहा था,
और मुझे ऐसा महसूस हो रहा था,
जैसे जोरो से थप्पड़ जड़ दिया हो किसिने.

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