
दीप नयनो के ये जो जलाए है तुमने,
ज्योति उसकी तो मन से गुजर सी गई है,
हर ख्वाब मे झिल्मिल है चंचल वो नयना,
स्नेह कि नूर मन मे उतर सी गई है.
दूर कितने भी क्यो ना हो तारो से नयना,
उनकि मोहक अदा मे सिमटी खुशबु नई है,
बाहर लगा हो भले कही दीपों का मेला,
मन के अन्दर बसी यह दिवाली नई है.

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