पुनः अट्टालिका का प्रारूप तैयार है, एक बार फिर नए सिरे से,
नीव कि खुदाई की जा रही है,
सपनो का एक नया महल बनेगा यहाँ.
पुराने महल के सपने,
जो सवेरे के स्वर्णिम किरणों के साथ,
जमींदोज हो जायेंगे.
चुपके से मुझे पूछते है,
क्यों दिखाया उन्हें सपना,
उँचे बुर्जो से खड़े हो कर,
दूसरों की आँखों से दुनिया देखने का.
और मै मौन बढ़ जाता हूँ,
काश की उन्हें समझा पाता,
मानव मन की उलझन,
सपनो की सच्चाईयाँ,
उनके टूटने का दर्द,
जीवन की हकिकत,
विश्वास की बारीकियाँ,
ये सब उसे भुलाने के लिए ही तो है.
महल तो नए बनते रहेंगे,
पर पहले महल की नीव का अवशेष,
क्या कभी मिट पायेगा.

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