भीड़ भरे उस बस पराव पर, यों तो मन लुभावन कुछ भी नही था,
सिवाय शोर मचाती गाड़ी कि इंजन,
और परेशान धक्के खाते इंसानो के,
पर वहां दिखी एक छोटी सी घटना,
आज एक बार फिर मुझे,
जिन्दगी को नये सिरे से,
देखने को प्रेरित करती है,
कचोटता है मन को यह प्रश्न,
सच क्या है?
वो जो मैने वहां देखा,
उस अन्धे युवक कि,
कर्तव्य और संघर्ष कि पराकाष्ठा,
या वो जो हम सोचते है,
प्रेम और सामंजस्य कि संपूर्णता.
जितना सोचता हूँ, उलझता हूँ,
सुत्रपात कहाँ से करू,
इतिहास कि डोर कहाँ से खींची जाएगी,
कर्तव्य से या प्रेम से,
अगर प्रेम ना हो तो कर्तव्य किसके प्रति,
फिर तो वह परोपकार हो जायेगा.
पर बिना कर्तव्य प्रेम भी तो नही हो सकता,
फिर वह प्रेम निराधार हो जयेगा.
अगर फैसला लेना ही पड़े तो,
मै कर्तव्य को प्रथम मानूँगा,
जो निबाह रहा था, उस भीड़ में,
वो अंधा बेटा, अपनी बीमार अंधी मॉ के साथ,
जिनका शायद और कोई नही था इस दुनिया में,
सिवाय जिजीविषा और परष्पर विश्वास के,
वह विश्वास जिससे संघर्ष कि प्रेरणा पाता है मनुष्य,
और उस संघर्ष के प्रश्रय में ही प्रेम पलता है,
इसलिये प्रेम किया नही जा सकता,
यह कर्तव्य कि परीक्षा और संघर्ष कि पराकाष्ठा है.

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