Friday, November 30, 2007

आज फिर याद आ रहा है...

दूर हूं मै बहुत तुमसे, पल पल मन में जल रहा हूँ,
सच्चाईयों से टूटता हूं, इंसानी सांचे मे अब ढल रहा हूँ,
आदर्श और संघर्ष मे ही, खो गया है होश मेरा,
आज फिर याद आ रहा है, आंचल मे सिमटा प्यार तेरा.

मानता हूं भाग्य ने सुख भी दिया है, पर छला है,
अभिमान भरि अट्टालिका से, गॉव का छप्पड़ भला है,
बह रहा है आज चहुँ ओर, मन मे सिमटा विश्वास मेरा,
आज फिर याद आ रहा है, आंचल मे सिमटा प्यार तेरा.

ढूंढता एक नजर तुझसा, पर नही कोई तेरे कण सा बना है,
मारीचिका के बुलबुले में, बस चुभन है या दगा है,
क्यों किया मुझे दूर खुदसे, छिन गया सारा स्वपन मेरा,
आज फिर याद आ रहा है, आंचल मे सिमटा प्यार तेरा.

जननी है तू जानकी है, बात मन के जानती है,
कौन हूं, क्या चाहता हूं, मुझसे अधिक पहचानती है,
बिश्वास के उस डोर से, अब भी बंधा हर श्वांस मेरा,
आज फिर याद आ रहा है, आंचल मे सिमटा प्यार तेरा.

रख ले यह शीश गोद मे अब, जिसमें कभी मैं सिमटा पड़ा था,
खो जाऊँ फिर उस आशिया में, जहाँ से यह अंकुर आगे बढा था,
आज भी महसूस करता, हर आहट पर एहसास तेरा,
मॉ फिर याद आ रहा है, आंचल मे सिमटा प्यार तेरा.

Thursday, November 29, 2007

सौंदर्य वर्णन...




सुन्दर शीतल सुरमय सुखकर,
मृदुल मनोहर मणिमय मधुकर,
कोमल कमल कांतिमय लोचन,
हरित हिरनी सम् काया कंचन.

अश्रुत अद्भुत अतुल अनिंदनिय,
सरस सुमधुर सकल स्नेहमय,
ललित लालमय अधर अकिंचन,
गर्वित ग्रीवा, सुधा सम् गुंजन.

निर्मल निर्विकार, प्रफ़ुल्लित पल्लव,
आद्र अधर कोकिल कि करलव,
शुभ्र श्याम सन् स्नेह स्वरूपा,
विभुति विप्र वाला, बड़ी विदुषा.

चंचल चपल चराचर चर्चित,
मुदित मुखर मीन मर्यादित,
अटल अडिग अविचल सती सीता,
रौद्र रूप रमणी गुण गीता.

बरित् बर्णित बस ब्यास बखाना,
पंकज पथिक प्रित क्या जाना,
स्विकार स्नेह सम् सुंदर वाणी,
मनुहारि मृदु मगर अभिमानी.

कब तक रहोगी मौन यो तुम...

शब्द सारे सिमट रहे है, दृग दरश को तरस रहे है,
तल्ख तिरष्कृत तड़प रह मैं, भीड़ मे भी भटक रहा मै,
शांत हूं गुमसुम पड़ा हूं, अस्त अकिंचन अधमरा हूं,
कही ना हो जाए धड़कने गुम, कब तक रहोगी मौन यो तुम.

देखो दिशाएं बोलती है, राज दिल के खोलती है,
पवन भी जब प्रेम पाता, कितने विरह के गीत गाता,
सरिता सरगम घोलती है, कल कल कर किल्लोलती है,
एक तुम हो कि बस गुम, कब तक रहोगी मौन यो तुम.

झींगुड़ो के गान देखो, शब्द के है प्राण देखो,
शब्द जो भावुक बड़े है, शब्द जिन में अमृत जड़े है,
मत उन्हे तुम आजमाओ, दर्द दिल मे मत दबाओ,
रहो ना अब यों तल्ख गुम्सुम, कब तक रहोगी मौन यो तुम.

देखो सागर लहर वाले, लवण वाले भोले भले,
वो भी तट को चुमते है, खुब खुशी से झुमते है,
कर समर्पित ज्वार भाटा, मन ही मन सन्तोष पाता,
फिर तुम्हारा ह्रदय चन्दन, कब तक रहोगी मौन यो तुम.

देखो धीरज डोलता है, मन मेरा सब बोलता है,
परीक्षा कि घड़ी है ये, मगर बहुत बड़ी है ये,
क्षण लगता बरष का सा, तू मुझ पर तरष अब खा,
सुन पथिक का विरह क्रंदन, कब तक रहोगी मौन यो तुम.

दिल कहाँ मेरा बड़ा है, राम सा यह नही कड़ा है,
फिर सीता को बनवास क्यों दूं, जगत का उपहास भले लूं,
बुद्ध सा नही विरक्त हूं मैं, सरल स्नेहाशक्त हूं मैं,
छोड़ो अब ये मौन स्पंदन, कब तक रहोगी मौन यो तुम.

देखो मै सब जानता हूं, बात सारे मानता हूं,
दोष दीपक का ना होता, भंवड़ा खुद ही प्राण खोता,
जिंदगी के इस भंवर में, स्व नही तो शब्द तो दो,
तुम नही मुझ सी अकिंचन, कब तक रहोगी मौन यो तुम.

मौन करुणा जानता हूं, पर अधिक कहाँ माँगता हूं,
जो निहित है नेह मेरे, विधि हाथो स्नेह तेरे,
जिसे कि तुम सब पर लुटाती, फिर मुझे क्यों भुल जाती,
कर रहा फिर से निवेदन, कब तक रहोगी मौन यो तुम.

मासूम है अत्याचार तेरा, सुन्दर ये प्रतिकार मेरा,
ये सजा लम्बी बड़ी है, माँग मेरी भी यह आखिरी है,
भविष्य का ना आस खो दूं, और जग का विश्वास खो दूं,
पर रहे है शब्द अब कब, छोड़ दो ना मौन ये तुम,
मत रहो ना मौन यो तुम, तोड़ दो ना मौन अब तुम.

मैं हर पल तुम्हे देखता हूँ!

मैने नदियाँ देखी है,
लहराती बलखाती इठलाती नदियाँ,
कल-कल कर बहती शर्माती नदियाँ,
किनारे के मर्यादाओं को मानती नदियाँ,
प्यासे पथिक के भावनाओ को जानती नदियाँ,
उन नदियों मे तुम्हे देखता हूँ.

मैने पर्वतो को देखा है,
गौरवोन्मत् अटल अडिग पर्वत,
शैलभ शलोने सजल पर्वत,
वर्फीलि चादर ओढे धवल पर्वत,
नीले गगन से मिलने को विकल पर्वत,
उन पर्वतो मे तुम्हे देखता हूँ.

मैने फूलो को देख है,
सुन्दर स्नेहिल शर्मीले फूल,
मोहक मादक मनभावन फूल,
जीवन कि खुशियाँ लूटाते फूल,
भंवड़ों के गुंजन मे खुद लुट जाते फूल,
उन फूलों मे तुम्हे देखता हूँ.

मैने सूरज कि किरणें देखि है,
नित्य सवेरे अन्धेरे से लड़ती सूरज कि किरणें,
अपने लालिमा से जीवन कि लालि भरती सूरज कि किरणें,
मुस्कुराति हर किसी को गले से लगाती सूरज कि किरणें,
मन मे आशाओं कि ज्योति जगाति सूरज कि किरणें,
उन सूरज कि किरणें मे तुम्हे देखता हूँ.

मैने चांद को देखा है,
रात मे बाद्लो से लुका छिपी खेलता चांद,
प्रतिपल अपना अमृत रस उड़ेलता चांद,
दुख मे भी सुख का झलक दिखाता चांद,
जीवन जीने कि सारी कला सिखाता चांद,
उस चांद मे तुम्हे देखता हूँ.

मैने पथिक कि आंखे देखी है,
हर क्षण यादों मे खोई आंखे,
उल्लासित् जीवन के सपने संजोई आंखे,
उर्जा से भरी विकल आंखे,
कुछ कहती भोली सरल आंखे,
उन आंखो में तुम्हे देखता हूँ.

मैने तुम्हें देखा है,
कल कल करती नदि कि धारा तुम,
सूरज कि किरणे, भंवड़ो का सहारा तुम,
चंदा के चांदनी कि अमृत वर्षा तुम,
शैलों सी सजल, पथिक कि उर्जा तुम,
सच कहूँ, मैं हर पल तुम्हे देखता हूँ.

Wednesday, November 28, 2007

मैंने झूठ कहा था...

मैंने झूठ कहा था कि मैं तुम्हे चाँद में देखता हूँ,
हर पल चंचल, धब्बो भरा चाँद,
रात भर बादलो की ओट मे ख़रा चाँद,
सूरज की स्वर्णिम किरणें चुराता चाँद,
दिन में डर कर चेहरा छुपाता चाँद,
उस चाँद मे तुम कैसे दिख सकती हो.

मैंने झूठ कहा था कि मैं तुम्हे नदियो मे देखता हूँ,
शहरो के किनारो से गुज़रती काली गंदी नदिया,
बाढ़ की समस्याएं खड़ी करती अंधी नदिया,
अपने अंदर मनुष्य को लीलने वाली नरभक्षी नदिया,
सभ्यताओ के उत्थान पतन की साक्षी नदिया,
उन नदियो मे तुम कैसे दिख सकती हो.

मैंने झूठ कहा था कि मैं तुम्हे पर्वतो मे देखता हूँ,
ये काले कलुटे नुकीले पर्वत,
बादलो का रास्ता रोके हठीले पर्वत,
अपनी उँचाई के घमंड से चूर पर्वत,
आम जन के पहुँच से दूर पर्वत,
उन पर्वतो मे तुम कैसे दिख सकती हो.

मैंने झूठ कहा था कि मैं तुम्हे फूलों मे देखता हूँ,
ख़ुद की ख़ूबसूरती पर इतराते फूल,
काँटो का रस चूस उन्हे सुखाते फूल,
भौंड़ों को मतवाला बना उन्हे बहकाते फूल,
फिर ख़ुद सूख कर झड़ जाते फूल,
उन फूलों मे तुम कैसे दिख सकती हो.

मैंने झूठ कहा था कि मैं तुम्हे सूरज की किरणो मे देखता हूँ,
सोते मनुष्य के सपनो को तोड़्ती सूरज की किरणे,
आँधियारे से मुँह मोड़्ती सूरज की किरणे,
नदियो तालाबो को सुखाती सूरज की किरणे,
तन मन मे प्यास जगाती सूरज की किरणे,
उन किरणो मे तुम कैसे हो सकती हो.

तुम भी निड़ी भोली हो, मेरी हर बात मान लेती हो,
बिना सोचे समझे कुछ भी, क्यो हर शब्द पर जान देती हो,
ज़रा सोचो ख़ुद भी तुम, इन भौतिक चीज़ो मे कैसे हो सकती हो,
जब तुम मन के अंदर हो, तो बाहर कैसे दिख सकती हो.

यादों के झरोखे से तूझे ढूंढ मै लूंगा...

मै अमावस में चंदा को ढूंढता हूँ,
काले घने अन्धेरे आकाश के बीच,
टिमटिमाते तारो के लुकझुक प्रकाश के बीच,
भेड़ो के भीड़ से बाद्लो के प्रवाहो के बीच,
अर्ध रात्रि की निरव हवाओ के बीच,
मुझे विश्वास है कि चंदा जरूर दिखेगी.

मै पतझड़ मे फूलों को ढूंढता हूँ,
सूखे पत्तो भरे तनाओ के बीच,
वसंती मद भरी हवाओ के बीच,
पल पल बदलते स्वरूपो के संगम के बीच,
हरित्मा मन मे समेटे कपोलो के आगमन के बीच,
मुझे विश्वास है कि फूल जरूर खिलेंगे.

मै मैदानो मे पर्वतो को ढूंढता हूँ,
अनंत तक दिखती जमी कि दुरियो के बीच,
फासलो मे घुट्ती मिलन कि मजबुरियो के बीच,
गगन से मिलने को आकुल उठते किनारो के बीच,
बाद्लो के प्यार को ब्याकुल, व्यारो के बीच,
मुझे विश्वास है कि पर्वत जरूर दिखेंगे.

मै रेगिस्तान मे नदियो को ढूंढता हूँ,
सूरज कि तपिष मे जलते अरमानों के बीच,
रेतिली आंधी और धूल भरे तूफ़ानों के बीच,
मृगमारीचिका के आशा भरे स्वप्नो के बीच,
कंटीले कैक्ट्स और बबूल जैसे अपनो के बीच,
मुझे विश्वास है कि नदिया कही तो होंगी.

मै तूफ़ानो मे सूरज को ढूंढता हूँ,
बबंडरों सी घुमती अक्खड़ हवाओ के बीच,
जन जीवन को झंझोड़ती प्रचंड प्रवाहो के बीच,
प्रकृती के इन अनूठे पराक्रमों के बीच,
मानवीय मान्यता और विभ्रमो के बीच,
मुझे विश्वास है कि सूरज कि किरणे कभी तो पहूंचेंगी.

मै तुम्हारी यादों मे तुम्हे ढूंढता हूँ,
फासलो और सूने मन कि दूरियो के बीच,
कुछ ना कह सकने कि मजबुरियो के बीच,
भूत कि लम्बी घनी परछाइयों के बीच,
भविष्य के सपने समेटे रुश्वाईयो के बीच,
मुझे विश्वास है कि तुम आज भी वहाँ होगी.

सच कहूँ, तो जानता हूं झूठ है सब,
सच सुनोगी तो सुनो, जो लिख रहा हूँ अब,
पत्झड़ मे नहीं कभी फूल हैं खिलते,
तूफ़ानों मे नहीं कभी सूरज हैं उगते,
रेगिस्तानों मे नहीं नदियां हैं होती,
अमावस की रातों मे नहीं चंदा हैं दिखती,
पर फिर भी तुम्हारी यादों मे तुम ही सिमटी हो,
जज्बातो भरे फैसलों से मुझसे रूठी हो,
स्नेह कि सच्चाईयों से दूर जाती हो,
विश्वास कि गहराईयों को आजमाती हो,
मै फूल, चंदा, नदियों मे तुम्हे ही तो ढूंढता हूं,
वापस फिर कब आओगी, ये सब से पूछता हूं,
फासलों को विश्वास से तोड़ मै दूंगा,
यादों के झरोखे से तूझे ढूंढ मै लूंगा.

दरिया की व्यथा...

दरिया का सूना किनारा,
संध्या कि निस्तब्ध धारा,
मौन है ज्यो अजनबी है,
शांत गुमसुम बह रही है.

कहाँ छुपी वो उफ़नाती धारा,
कहाँ है वो चंचल किनारा,
कल तक जो संग खेलते थे,
मधुर संगीत से जो बोलते थे.

आज फिर क्यो शांत है सब,
माना बीता सावन था तब,
उफ़नाई दरिया हुंकारती थी,
किनारे तोरना वह जानती थी.

सागर मे ज्यो शैलाब सा था,
नाविक से ज्यो टकराव सा था,
विकराल हो उसे फ़ैलना था,
सरल उत्साह से सब देखना था.

सब ने उसे सराहा था तब,
उसने भी कुछ पाना चाहा था तब,
पर समझ ना पाया उस आवेग को वह,
चंदा की शीतल तेज को वह.

चंदा जो सूरज सी नही है,
खुद कि कहाँ उसे रोशनी है,
स्व तेज को वह आश्रिता है,
सब भांति कहाँ उसे स्वतंत्रता है.

जब तक कि वह समझ पाता,
चंदा का चितवन चुराता,
कालि अमावस आ चुकि थी,
और पुर्णिमा कि सर्वस्व चंदा,
निरव अंधकार मे जा चुकि थी.

तब से दरिया शांत है फिर,
उदास, स्थिर, मौन गम्भिर,
चंदा के ही इंतजार मे है,
बदला बदला व्यव्हार मे है.

आज संध्या के समय भी,
शांत गुमसुम बह रहा है,
फिर दिखेगी एक बार चंदा,
मन हि मन यह कह रहा है.

काश कि चंदा समझती,
शीतल किरण ले फिर उतरती,
बस एक बार सब समझा जाती,
आवेग मन का बुझा जाती.

पर नहि ये हो सकेगा,
दरिया चुप-चुप हीं बहेगा,
लौट आओ एक बार चंदा,
हर पल बस वह यहि कहेगा.

और चंदा दूर उससे,
बादलो मे छुप कर हंसेगी,
उठो बन कर दिखाओ सागर,
तब तक नही चंदा दिखेगी.

क्या कभी ये हो सकेगा,
दरिया क्या सागर बनेगा,
मर्यादित तट को छोड़ कर वह,
अगम जल मे मिल सकेगा.

सब संभव भविष्य के गर्त मे है,
अखंड आर्यावर्त मे है,
ये पंक्तिया सब कह सकेंगी,
इतिहास सुलझाये बिना नही रह सकेगी.

यह युद्ध समय से चलता रहेगा,
पल पल जीवन बदलता रहेगा,
स्नेह सींचित पंथ पर,
पथिक अविचल बढता रहेगा.

पहली होली का प्रथम प्रहड़...

सूरज कि किरणे अभी जगी नही,
फिर तेरे नैना क्यों चंचल,
दूर बहुत है रंगो कि बदरी,
फिर मन मे यह कैसा हलचल.

सिमटी तु नीली चादर मे,
जैसे सिमटा मासुम सवेरा,
अल्हड़ सी मस्त अदाओं ने,
डाला तुझ पर यह कैसा डेरा.

वासंति कोयल के ये करलव,
क्यो तन मन तेरे जगा रहे है,
रोम रोम मे सिमटी चंचलता,
क्यो मंद मदिर मुस्का से रहे है.

सागर से शांत मृदुल हृदय मे,
यह ज्वार कहाँ से आया है,
होली के इस पावन दिन मे,
क्या मेघों ने रंग बर्षाया है.

मुखड़े से खिलती ऐसी लाली,
जैसे कमल सुबह का खिलता है,
अधड़ो की तरुनाई मे सिमटी,
गुलाबी पंखुड़ियो की कोमलता है.

सीपी से श्वेत सुन्यनों मे,
सिमटे दो नभ के तारे है,
भवों की तीखी सी रेखा मे,
काजल लिपटी दो कटारे है.

केशों के ये बिखड़े लट हैं,
या काले घुंघराले बादल है,
मादक व्यार के झोके है,
या लहराते तेरे आंचल है.

गुस्से मे सूरज कि लाली,
सोते मे स्वर्णिम चंदा हो,
हंसती तो बिजुड़ी सी दिखती,
जैसे स्नेह कि पावन गंगा हो.

उस पर इन नाजुक अदाओ ने,
चहुँ ओर रंग बिखड़ाया है,
सिमटा हर रंग तुम्हारे चितवन मे,
कस्तुरि कि कंचन काया है.

रंगो से तेरा कुछ बचा नही,
मै और भला क्या कर पाऊंगा,
पहली होली के प्रथम प्रहड़ को,
कल याद मे कैसे लाऊंगा.

शरारत कह लो, या शर्माओ,
होठों कि हँसी चुराऊँगा,
तन भले रंगा हो जीवन ने,
पर मन को मै रंग जाऊँगा.


दूरी का एहसास है मुझे...

दूरी का एहसास है मुझे,
जानता हूँ पल पल तुझसे, दूर होता जा रहा हूँ,
अन्जाने शहर के कोलाहलों मे, विश्वास मन का खो रहा हूँ,
भटक रही है ये दिशाए, लड़खड़ाते अब उठते मेरे कदम,
राह लम्बी वीरान सूनी, कहाँ गई मुझे छोड़ कर तुम.

दूरी का एहसास है मुझे,
जानता हूं नदी के किनारे, बिछुड़ कर नहीं फिर एक होते,
सागर के मन को सींचने को, दूरी मे जीवन हैं जिते,
टूटता मन का किनारा, पड़ने लगी है सांसे अब कम,
राह लम्बी वीरान सूनी, कहाँ गई मुझे छोड़ कर तुम.

दूरी का एहसास है मुझे,
जानता हूं चंदा कि दूरी, सच मे धरा से दूर है वह,
पर देखो ना विश्वास उसका, जाए कहाँ मजबुर है वह,
मन मेरा क्यो यों डर रहा है, दूर ना हो जाओ कही तुम,
राह लम्बी वीरान सूनी, कहाँ गई मुझे छोड़ कर तुम.

दूरी का एहसास है मुझे,
जानता हूँ चक्र समय का, हर क्षण बढता जा रहा है,
टूटेगा कब मौन हिम सा, असहाय पथिक पथ मे खड़ा है,
अवसाद का हिम जमा मन पर, इंतजार मे है आंखे ये नम,
राह लम्बी वीरान सूनी, कहाँ गई मुझे छोड़ कर तुम.

दूरी का एहसास है मुझे,
समझ सको तो समझो तुम इसे, सब प्रयास कर थक सा गया हूँ,
मानता हूँ भूल हुई मुझसे, पर जख्म भी हर पल सहा हूँ,
दर्द विश्वास के यो टूटने का, क्या तुम मुझसी सह सकोगी,
और यादो के सहारे, कब तक जिंदा रह सकोगी,
तोड़ दो अवसाद मन का, व्यर्थ उनमे घुलती रही हो,
सच झूठ के आडंबरों मे, युगो से तो जलती रही हो,
एक झूठ यदि बोल कर मै, कुछ पल तुझको पा सकूँगा,
सच कहूँ तो सच समझना, जीवन भर झूठा रहूँगा,
कलम अब रूकने लगा है , पड़ने लगे हैं शब्द अब कम,
राह लम्बी वीरान सूनी, कहाँ गई मुझे छोड़ कर तुम,
स्नेह का दीपक जला है, मत जाओ ना मुँह मोड़ कर तुम.

दो पल...

तुमने ही माँगा था रब से,
हर दिन के दो पल मेरे हित मे,
मन कहता कि फिर तुझसे पूछूँ,
क्य पाऊंगा कभी उन्हे जीवन मे.

तुम मौन भले ही रह लेना,
छुपा लेना मन कि वीणा के स्वर,
बस दो पल मुझको दे दो ना,
पा जाऊँगा उसमे सारा उत्तर.

विश्वास यदि नहि हो मुझपर,
तो तुम सहर्ष प्रतिकार करो,
दो पल कि बात तो दूर रही,
पत्रोत्तर से इन्कार करो.

बस दो बाते रह जाएगी मन मे,
तेरा स्नेह कहां मैने खोया,
एक झूठ जो सच का दर्पण था,
उसने बीज जहर का कैसे बोया.

लाल फूल...

कुछ लिखना चाहता था फूलो पर,
कभी देखी थी तुम्हारी दिवानगी उनके प्रति,
कैसे बच्चों सी तुम मुग्ध थी उनकी सुंदरता पर,
आंखो मे हिरणी सी चंचलता थी तुम्हारे,
नजरे हर पल कुछ नया ढूंढ रही थी,
उन फूलो के ढेर मे,
कोई नया रंग, कोई नई खुश्बु,
कपोलो से कितने रंग आ-जा रहे थे,
मानो तुम उनके रंग चुरा रही थी,
इतना खुश पहले कभी नही देखा था तुम्हे,
चकित था मै, कभी सोचा नही, समझ नही सका,
कि फूल इतने प्यारे होते है कि,
अपने रंगों से मन की दुनिया रंग सके.

आज जब उन फूलो को देखता हूँ,
तो मन मे एक मीठा सा एहसास होता है,
और दुनिया सिमट जाती है मेरी,
उस एक फूल कि पंखुड़ियों मे,
जो सब से सुंदर है मेरे लिये,
पता नही वो फिर कभी दिखेगी या नही,
पर मन का कोई कोना रंगने से नही बचा है.

सतरंगी दिवाली...

दिन ढलता जा रहा है, शाम होने को पड़ा है,
आज है सतरंगी दिवाली, स्नेह से भींगी दिवाली.

दीप हाथो मे पड़े है, बदन पर सब वसन नये है,
तारो के इंतजार मे हूँ, तिमिर के सत्कार मे हूँ,
शायद कभी ऐसा हुआ था, अयोध्या दीपो से सजा था,
आज पुनरावृति उसकी, वनवास से पा राम मुक्ति,
लंका से विजय होकर, और सीता साथ लेकर,
पुनः महलो मे पधारे, प्रजा जनो के भाग्य तारे,
उन क्षणों के याद कि, और कुछ फरियाद कि,
आज है सतरंगी दिवाली, स्नेह से भींगी दिवाली.

सूरज तो अब ढल चुका है, बस किरण कुछ शेष बचा है,
याद आते क्षण वो अब मुझे, जब पिता जी सबसे पहले,
सरकंडो कि थे हुक्का जलाते, और देवो को दिखाते,
फिर आंवले के पेड़ को, अन्जाने मन्त्रो से समझाते,
तब कहि हम नट्खट भोले, कुछ और कि थे अनुमति पाते,
आज वही सतरंगी दिवाली, स्नेह से भींगी दिवाली.

फिर शुरु होत था अनगिन, दियो का कतार कमसिन,
पूजा और मन्त्रोचार सारे, बड़े जनो के प्यार सारे,
पटाको कि अन्गिनत लड़िया, रंग विरंगी छोटी फुल्झड़िया,
माँ मेरी बन संवर कर, पूजा कि थाल आंगन मे धर,
करती थी इंतजार बैठी, पंडित जी के आने तक कि,
हमे भला फ़ुर्सत कहाँ था, पटाको में हि मन रमा था,
आज वही सतरंगी दिवाली, स्नेह से भींगी दिवाली.

फिर हम सब दोस्त सारे, भोले भाले प्यारे प्यारे,
कि निकल पड़ती थी टोली, नाजुक निर्भय वो हमजोली,
गाँव सारा घुमते थे, खुब खुशी से झुमते थे,
गीत जो आते थे थोड़े, गाते थे ले ले हिलोड़े,
अंत मे थक चूर होते, घर लौटने को मजबूर होते,
फिर पता नही नींद मे, कैसे मनती थी दिवाली,
आज वही सतरंगी दिवाली, स्नेह से भींगी दिवाली.

अब कही जब दूर हैं सब, विधि हाथो मजबूर है सब,
स्वप्न से लगते है वो पल, मानो देखा था उन्हें कल,
और ये रात आ पड़ी है, कार्तिक अमावस काली बड़ी है,
बस एक दीपक जल रहा है, आंच नही धीमा पड़ा है,
भीड़ से छुप कर अकेला, खोया सा चंचल वो पगला,
और अपनी ही झीनी लौ से, तस्वीर बनाता झिलमिल सुनहला,
ऊपर धुएं मे उल्झाता, काली लटो का ख्वाब गहरा,
काश उसे कोई बताता, या कि वो फिर समझ पाता,
जब बाति ही नही संग उसके, कब तक जलेगी दीप खाली,
और ख्यालो मे यू हीं, कैसे मनेगी ये दीवली,
नेह से रंगी दिवाली, स्नेह से भींगी दिवाली.

मेरी राधा...

जैसे केशव की राधा थी,
वैसी हीं मेरी राधा है.

वह मुर्तिमयि वह प्रेमरूप,
वह शशि समान उज्ज्वल स्वरूप,
वह कांतिमयि वह ह्रिदय वत्सल,
वह स्नेह स्वरूप चंचल निश्चल.

नख से शिख तक वो चन्द्र प्रभा,
देती रजनी को भी आभा,
वह मादक मुरली के मधुर धुन सी,
मै प्रिय वो मेरी प्रेयसी.

मै चातक हूँ, वह है चकोर,
दीपक पर ज्यो किटो का जोर,
वह प्रेम सुधा वर्षाति है,
आकुल ह्रिदय को भर्माति है.

चन्दन समान वो है शीतल,
कुन्दन समान वो बीच अनल,
वाणी से सुधा लुताती वो,
मन उसका जैसे गंगाजल.

उसने है पथिक को प्राण दिया,
उसने है ह्रिदय को गाण दिया,
उससे जीवन को लक्ष्य मिला,
राही को मंजिल का साक्ष्य मिला.

वह यो ही मनमोहक व्यार रहे,
सपनो कि स्वछंद बहार रहे,
दुख हो ना तुझे कभी भी तनिक,
हर पथ पर बिछा पाये पुष्प पथिक.

तू राधा ओ मेरी राधा,
मै केशव नही तनिक भी सा.

आतुर आकांक्षा...

यह रोग है क्या होता है क्यो,
अब तक ना उसने जाना था,
इशारों पर हिलता था इन्द्रासन,
मर्त्य नर का कहा ठिकाना था.

देवों का क्या वह सम्मान करे,
जब देवेन्द्र स्वयं थर्ड़ाते थे,
आने वाली हर विपदा में,
नंगे पॉव तो दौड़े आते थे.

स्वर्ग का सुन्दर रंग महल,
जिसके रूप राग मे डूबा था,
श्रिष्टी की थी वो अनुपम किर्ति,
रूप गुण दोनो ही अजूबा था.

सौ जन्म तपस्या कर भी ऋषि,
सौभाग्य समझते जिसके दर्शन मे,
उस पत्थर ह्रिदय मे यह पीड़ा,
क्यो उठी आज यों क्षण भर मे.

मन मे कैसे उमड़ रहे विचार,
ज्यों मंथन सागर का होता है,
करने को अपना सर्वस्व न्योछावर,
क्यो तड़प तड़प मन रोता है.

बस खोना चाहे अपना सर्वस्व,
नहि दूजी कोई अभिलाशा मन में,
ये लपटे क्यों तन को जला रही,
आती ये कहॉ से अंतर्मन में.

वह एक नजर ले गई उसे,
ना जाने किस अद्भुत अंजाने में,
जीवन जिसने देवी का जिया,
आतुर थी दासी बन जाने में.

उर्वशी कि इन आतुर आकांक्षा को,
अर्जुन अनभिज्ञ ना जान सका,
आर्ये कि है कुछ ऐसी गति,
मन उसका यह ना मान सका.

नजरों में भरा सम्मान मातृत्व का,
पग रज लेने ज्यों आगे बढा,
जीवन गति के यों अनादर का,
तत्क्षण उसको अभिशाप लगा.

बोली उर्वशी हे वीर धनुर्धर,
जैसे मुझे अपमान तेरा सहना होगा,
जीवन मे तुझे भी कभी ना कभी,
वृहण्ला बन बर्षों रहना होगा.

नारी मन का यों घोर अनादर,
आज तक ना किसी ने जाना होगा,
क्या यही है पुरुषोचित् कर्म तेरा,
किस विधि अब मुझे लुट जाना होगा.

क्या नही है मुझमें अद्भुत सौंदर्य,
फिर क्यों तुमने मुझे ठुकराया,
चिर यौवन कंचन रूप मेरा,
अक्ष्क्षुण अतुलनिय है काया.

नजरो की पैनी धार से तो,
खुद स्वर्गाधिपति भी डरते है,
महर्षि और ब्रम्हर्षि भी,
तप छोड़ कर आहे भरते है.

फिर तुम तो नहीं पत्नीव्रता,
ज्यो द्रौपदी संग सुभद्रा जीति है,
पा जाती मै भी एक ठौर वहॉ,
नही कम किसी से भी मेरी प्रीति है.

उस देवी कि ऐसी बाते सुन,
अर्जुन का जैसे सपना टूटा,
किस मुँह से अब क्या बात करे,
क्या भाव ह्रदय का है झूठा.

आवेग मे अंधी रमणी को,
अब मुझे सब समझाना होगा,
कैसे था यह पुत्रोचित् कर्म मेरा,
नरोचित् मर्यादा बतलाना होगा.

पाते है स्नेह विरल जग में,
यह सच है सब ने माना है,
पर लुट जाना उस के आवेग मे ही,
यह नहीं धर्म का बाना है.

नर और नारी के जीवन में,
प्रणय से भी बढ कर कुछ रिश्ते है,
कर्तव्य कि होती तब प्राकष्ठा,
जब माँ के रुधिर से शिशु सींचते है.

उस मातृत्व के अनुपम बंधन से,
बढ कर दूजा कोई ड़ोर नही,
सौ जन्म समर्पित है उस पर,
तुझ से मेरा है नेह वही.

हैं देवेन्द्र हमारे पितृ तुल्य,
तुम उनके प्रासाद कि मलिका हो,
सौंदर्य पर जिसके मुझे है गौरव,
हा द्रौपदी नहि तुम देविका हो.

सोचो आर्ये किस भाँति भला फिर,
तुझसे मैं प्रणय की आशा करता,
जिसको पूजा है जीवन भर,
उस कलश मे जहर कैसे भरता.

फिर माते तेरी यह प्रीति,
यदि ह्रदय से उपजी सच्ची प्रीति है,
तो तेरा यह श्राप भी मेरे हित,
अमृत से बड़ी विभूति है.

तेरे मन का यह स्नेह यदि,
रूप बदल मुझे मिल पाये,
सौभाग्य समझूं उस जीवन को,
माता जो तुझ जैसा पाए.

सुन कर अर्जुन कि सब बातें,
उर्वशी का मन फिर भर आया,
आंखो के कोर में अश्रु लिये बोलि,
अर्जुन तुने मुझे हत् भागिनि बनाया.

यदि सच में यह बस प्रिति मेरी,
ना पड़े कभी तुम पर मेरी छाया,
जा पाना चाहे तू जिस रूप मुझे,
वैसी ही दिखे तुझे मेरी काया.

पर समझ ना सकी उस आतुरता को,
जिसके हठ यह सब ठाना था,
श्रृष्टिकर्ता भी जिसे समझ ना सके,
उस देवी का कहॉ ठिकाना था.

अपना सर्वस्व समर्पण भी,
यदि गृहित कर्म है लिप्सा है,
फिर क्यो कहलाता प्रेम अमर,
प्रणय भाव यदि पातक्ता है.

था सच पर अर्जुन या दोष उसका,
मन सोच कर बरबस रोता था,
जीने की बांकि बची चाह नही,
नयन आंसू का अविरल सोता था.

कर्ण और केशव...

सब शांत पड़ा है कोलाहल, है जीवन का पल ये रूका हुआ,
निरुपाय खड़ा है अजेय कर्ण,रथ - चक्र जमीं मे धंसा हुआ.

है देख रहे सब जन रुक कर,ठहड़ा है समय, कह रहा संजय,
है सोच मे पार्थ भी डूबा हुआ,ललकार रहे है उसे धनंजय.

मौक़ा नही यह फिर आने वाला,रणभूमि मे नही करते विचार,
है खड़ा शत्रु असहाय भूमि पर,शर से उसका कर दे संहार.

कह रहा पार्थ, नही केशव,क्या यह वीरो का बदला होगा,
कल जीत अगर भी जाएँगे हम,सिर पर छल का सेहरा होगा.

इस कायरतम कार्य के बाद,फिर कहाँ मूँह दिखाने जाएँगे,
जब परलोक की बारी आएगी,गुरु द्रोण को क्या बतलाएँगे.

यह सुन केशव का चेहरा,क्षण भर को तो मुस्काया,
उस रंगमंच की कठपुतली के,आवेग पर मन मे दया आया.

बोले केशव हे पार्थ सुनो,यह नही नीच कायरता है,
कायरता क्या है इन से सिखो,जब सात एक से लड़ता है.

क्या दोष था तेरे अभिमन्यु का,जिसने इसी भूमि मे प्राण गँवाया है,
और इस सूत कर्ण के वाणो से,छलनी हो मिर्त्यु को पाया है.

ग़लती क्या इन लाखो आर्यो का है, जो रण मे यो जीवन देते है,
घर पर जिनके बीबी बच्चे,ख़ून के आँसू रोते है.

ग़लती क्या उस द्रोपदी की थी,जिसकी लाज इन्होने लूटी थी,
यह वही कर्ण है ख़रा आज,जिसके समक्ष मर्यादाएं टूटी थी.

सोच और ना पार्थ आज,फ़ैसला आज तेरे हाथो मे है,
एक कर्ण के मरने से,बचता सुहाग लाखो मे है.

यह युद्ध यही हो रहा ख़त्म,फिर बस पूर्णाहुती रह जाएगी,
जिसने है जैसा कर्म किया,समय - चक्र उसे वही गति दिखलाएगी.

सब सुन अर्जुन ने फिर मन से,हर संशय का समाधान किया,
आँखों मे लज़्जा लिए झुका मस्तक,शर का प्रत्यंचा पर संधान किया.

सब देख सर्वज्ञ दानवीर कर्ण,मन ही मन हँसा और मौन रहा,
जीवन की थी अंतिम वो घड़ी,पर मन मे था उसे संतोष बड़ा.

केशव के हर दोषारोपण का,दे सकता था उस पल उत्तर,
उस वक़्त कहा थे वो केशव,जब भीष्म का शैया बना था शर.

फिर द्रोपदी के उस हालत का भी,क्या दुशासन असली दोषी था,
दोषी था मूक वह धर्मराज,धुत मे रखा जिसने उसे बलि पर था.

उस से बढ़ कर वह द्रुपद पुत्री,पांचाली की थी जिसकी काया,
अंधे का पुत्र है बड़ा अंधा,यह कहना उसे कैसे भाया.

फिर जीवन का क्या लेखा जोखा,जो जन्म लिया उसे मरना है,
दोषी था कौन, था दोष किसका,कह कर किसे क्या सावित करना है.

बस कोषा उसने उस दिन को जब,एक कुमारी ने था उसे जन्म दिया,
उस माँ की ग़लती ने उसका,जीने का हर हक़ छीन लिया.

वरना कमी क्या थी कौंतेय् मे,जो वह यों राधेय् कहलाया,
पराक्रर्मी परषु सा गुरु पा कर भी,क्यो हो गयी यो शापित काया.

फिर नर की होती अंतिम इच्छा,बस स्वाभिमान से जीने की,
इस हित उसने क्या कवच-कुंडल,निज जीवन तक की भिक्षा दी.

फिर आज जब बारी आई है, रण मे दुर्योधन हित लड़ने की,
मित्रता की रहने दो लाज केशव,ले लो मेरी भी आहुति.

हो गया कर्ण फिर खड़ा ठोक,छाती उस शर को खाने को,
रथ-चक्र की अब कहा बात रही,जीवन-चक्र ही जब है जाने को.

अर्जुन के उस शापित शर ने,फिर मस्तक का संधान किया,
कट गिरा वीर वह भूमि पर,ज्यो सैकड़ों सूरज संग अस्त हुआ.

यो ख़त्म हुआ एक बड़ा कंटक,युद्धिष्ठिर यह सुन बहुत हर्षाए,
सस्नेह बंधु के गले मिले,जीवन दान के बोझ से थे उबर पाए.

बस हारा था आज मन से अर्जुन,जिसने कायरता को कर्तव्या गति माना था,
जीत कर भी यो हरेगा वो,आज पहली बार तो उसने जाना था.

Tuesday, November 27, 2007

खुशियाँ लुटाना चाहता हूँ...


इस छोटी सी जिन्दगी के, गिले-शिकवे मिटाना चाहता हूँ,
सब को अपना कह सकूँ, ऐसा ठिकाना चाहता हूँ,
टूटे तारों को जोड़ कर, फिर आजमाना चाहता हूँ,
बिछुड़े जनों से स्नेह का, मंदिर बनाना चाहता हूँ.

हर अन्धेरे घर मे फिर, दीपक जलाना चाहता हूँ,
खुला आकाश सा हो घर मेरा, नही आशियाना चाहता हूँ,
जो कुछ दिया खुदा ने, दूना लौटाना चाहता हूँ,
जब तक रहे ये जिन्दगी, खुशियाँ लुटाना चाहता हूँ.

कर्तव्य...

भीड़ भरे उस बस पराव पर,
यों तो मन लुभावन कुछ भी नही था,
सिवाय शोर मचाती गाड़ी कि इंजन,
और परेशान धक्के खाते इंसानो के,
पर वहां दिखी एक छोटी सी घटना,
आज एक बार फिर मुझे,
जिन्दगी को नये सिरे से,
देखने को प्रेरित करती है,
कचोटता है मन को यह प्रश्न,
सच क्या है?
वो जो मैने वहां देखा,
उस अन्धे युवक कि,
कर्तव्य और संघर्ष कि पराकाष्ठा,
या वो जो हम सोचते है,
प्रेम और सामंजस्य कि संपूर्णता.

जितना सोचता हूँ, उलझता हूँ,
सुत्रपात कहाँ से करू,
इतिहास कि डोर कहाँ से खींची जाएगी,
कर्तव्य से या प्रेम से,
अगर प्रेम ना हो तो कर्तव्य किसके प्रति,
फिर तो वह परोपकार हो जायेगा.
पर बिना कर्तव्य प्रेम भी तो नही हो सकता,
फिर वह प्रेम निराधार हो जयेगा.

अगर फैसला लेना ही पड़े तो,
मै कर्तव्य को प्रथम मानूँगा,
जो निबाह रहा था, उस भीड़ में,
वो अंधा बेटा, अपनी बीमार अंधी मॉ के साथ,
जिनका शायद और कोई नही था इस दुनिया में,
सिवाय जिजीविषा और परष्पर विश्वास के,
वह विश्वास जिससे संघर्ष कि प्रेरणा पाता है मनुष्य,
और उस संघर्ष के प्रश्रय में ही प्रेम पलता है,
इसलिये प्रेम किया नही जा सकता,
यह कर्तव्य कि परीक्षा और संघर्ष कि पराकाष्ठा है.

जीवित सपने!...

यह सच है कि ये सपना था,
देखा जो जीवन मे मैने कभी,
पर सपनो का भी होता है जीवन,
जीवित है वो सपने आज अभी.

टूटा एक महल है सपनो का,
बना था जो सपनो मे ही कभी,
सुन्दर था जो स्वर्ग के महलो से,
जीवित है वो सपने आज अभी.

था वह सपना या स्नेह मेरा,
सच समझ ना पाया अब तक भी,
बदल रही है जीवन कि दिशा दशा,
पर जीवित है वो सपने आज अभी.

सपनो से भरि ये दुनिया है,
पूरे होते क्या स्वप्न कभी,
क्या इसलिये नहि वो सपने है,
क्योकि जीवित है आज अभी.

सपने पागल, सपने सुन्दर,
सुन्दर सपनो में सिमटी है याद तेरी,
जीवित है वो सपनो का ताजमहल,
तू ताज मे जिन्दा हर पल हीं.

क्या कभी मिट पायेगा!...

पुनः अट्टालिका का प्रारूप तैयार है,
एक बार फिर नए सिरे से,
नीव कि खुदाई की जा रही है,
सपनो का एक नया महल बनेगा यहाँ.

पुराने महल के सपने,
जो सवेरे के स्वर्णिम किरणों के साथ,
जमींदोज हो जायेंगे.
चुपके से मुझे पूछते है,
क्यों दिखाया उन्हें सपना,
उँचे बुर्जो से खड़े हो कर,
दूसरों की आँखों से दुनिया देखने का.

और मै मौन बढ़ जाता हूँ,
काश की उन्हें समझा पाता,
मानव मन की उलझन,
सपनो की सच्चाईयाँ,
उनके टूटने का दर्द,
जीवन की हकिकत,
विश्वास की बारीकियाँ,
ये सब उसे भुलाने के लिए ही तो है.

महल तो नए बनते रहेंगे,
पर पहले महल की नीव का अवशेष,
क्या कभी मिट पायेगा.

थप्पड़...


सारे शहर कि गंदगी,
उस गन्दे नाले से होती हुई,
पास के नदि मे मिलती थी,
जिसके किनारे उसने,
बाँस कि तीन-चार कमानियों पे,
अपना आसियाना टिका रखा था.

और सवेरे सवेरे अपने दुलारे,
सांवले नट्खट मुन्ने को,
उस पानी से नहलाते हुए भी,
उसकि आंखो मे एक संतोष झलक रहा था,
और मुझे ऐसा महसूस हो रहा था,
जैसे जोरो से थप्पड़ जड़ दिया हो किसिने.

देखो ना तुम्हारे बिना...

देखो ना तुम्हारे बिना, ये फूल आज मुरझा से गए है,
पत्तो का रंग है बेरंग, काँटे तक सकुचा से गए है,
बहती ब्यारों की खुशबु मे क्यो, यों रूठने की बू आ रही है,
मासूम से मौसम मे अचानक, ये कैसी मायूसी छा रही है.

दीपक की ये रोशनी, क्यो आज झिल्मिल हो रही है,
हवा के एक झोके से बस, क्यो आस लौ कि खो रही है,
तिमिर के प्रसार से क्यो, मन आज इसका काँपता है,
संबल जो था दूसरो का, क्यो आज बगले झाँकता है.

सपनो का सुहाना घरौंदा, पल मे जैसे ढह सा गया है,
मन की उमंगो का दीपक, जल मे जैसे बह सा गया है,
सुहानी यादों का हर नज़्म, बस गीत यह एक गा रहा है,
लौट आओ ना फिर एक बार, कोई हर पल तुझे बुला रहा है.

आदमी या घोड़ा...


बचपन मे एक दिन,
मैने एक तांगा खड़ा देखा,
और उसमे जुता घोड़ा,
सोता हुआ अड़ा देखा.

गले में उसके लटक रहि थी,
एक चने कि छोटी बोरी,
और आंखों पे पट्टी बन्धि थी,
देख सके वो आगे थोड़ी.

कौतूहल बस मै पूछ बैठा,
यार यह जीवन कैसे जिते हो,
दिन भर जुते हुए हो,
फिर भी नहि तनिक खिझे हो.

हंस कर वो मुझ से बोल उठा,
जा खेल कूद दिन थोड़ा है,
मै तो बस तन से घोड़ा हूँ,
आदमी तो मन से घोड़ा है.

सुन कर के उसकि ये बातें,
लगा कि कुछ-कुछ रूठा है,
आदमी से शायद जलता है,
या फिर दिन भर का भूखा है.

बात गई बचपन बीता,
मै शिक्षा पा आस्वस्थ हुआ,
अच्छी जगह में नौकड़ी मिली,
आगे का मार्ग प्रसस्थ हुआ.

फिर कल जब रात्रि भोज पर,
मित्र से जीवन कि परिचर्चा कि,
उसकि बोझो के दुखड़े सुने,
और अपनि दिनचर्या दी.

हंस कर बोला वो मित्र मेरा,
तू आदमी है या घोड़ा है,
नास्ते मे चना, और दिन भर काम,
रंग-रलियो का शौक ना थोड़ा है.

यह सुन कर मेरे अंतर्मन में,
उस घोड़े कि बात उमर आई,
वो तो मजबुरी बस घोड़ा था,
मैनें मन को बस मे कर,
सचमुच घोड़े कि गति पाई.

कौन हूँ मैं...

सुविधाओं से भरि दुनिया में,
हम बहुत कुछ पाते है,
और अपना अस्तित्व भुला जाते है,
मन मे प्रश्न आता है, कौन हूँ मैं.

यदि मौका मिले तो,
किसी काम-काजि दिनो मे,
मुम्बई जाइये,
और वहां के लोकल ट्रैन का आनंद उठाईये,
उत्तर आप पा जायेंगे शायद.

क्या बताऊ रोटी का सवाल है...







अंग्रेजी गाने सुना जा रह था,
मन मे सपने बुना जा रहा था,
बैठा एक रिक्शे में अन्धेरि रात को,
घर कि तरफ़ बढा जा रहा था,
सॉफ़्टवेयर इन्जिनियर कि जिन्दगी हीं कुछ ऐसी है,
क्या बताऊ, रोटी का सवाल है.

रिक्शा आगे बढा जा रह था,
अचानक एक झटका सा लगा, सोते से मै जगा,
चुटकि का आवाज, कुछ पहचाना पहचाना सा लगा,
देखा एक युवा, ड्राइवर को कुछ समझा रहा था,
और ड्राइवर गिड़्गिड़ा रहा था,
नहीं है दादा, सच कहता हूँ, आज खस्ता-हाल है,

झगड़ा आगे बढा जा रहा था,
मै चुप-चाप सुना जा रहा था,
फिर एक पिस्टल आ गया युवा के हाथ मे,
ड्राइवर के सिर से लगा वो बैठ गया उसके साथ मे,
देख धन्धे का टाईम है, सुखे गले का बुरा हाल है,
जो कुछ है देता जा, यदि जीने का ख्याल है.

काँप्ता हाथ, गल्ले मे कुन्जि लगा,
जो कुछ था सब ले युवा कि तरफ़ आगे बढा,
सुखे पीले पत्ते सा चेहरा, आँखों मे लुटने का मलाल था,
युवा कि सुर्ख आँखों मे, कसाई सा भूचाल था,
फिर गाड़ी चला जा रहा था,
मै बैठा छट्पटा रहा था,
पूछा ड्राइवर से भैया ये क्य बुरा हाल है,
उसने कहा क्या बताऊ रोजि का सवाल है.

गाड़ी फिर चला जा रहा था,
मै बैठा पछ्ता रहा था,
वो तो गरीब ड्राइवर है, हम बुद्धिजीवियों का क्या हाल है,
उदय भारत के नौनिहालों, से ही तो देश बेहाल है,
समय बिता जा रहा था, और मै मन को समझा रहा था,
हफ़्ता, चोरी -कत्ल, यहाँ तो रोज का यह हाल है,
बूझ तो जाऊ मगर, घर के चिराग का सवाल है.

शायद!...

साफ़ है आकाश सुनापन समेटे,
लगता नहि फिर कभी बारिष होगी यहाँ,
नहि छाएंगि कालि घटाएँ फिर से,
और बिजलियाँ भि नहि छिटकेगी शायद.

रस विहिन हो जायेंगी धरा,
मुर्झा जयेंगे हरे-भरे पौधे,
सूख जाएंगी उनकि टहनियां भी,
और खजूर के कंटीले पेड़ उगेंगे शायद.

प्यास से व्याकुल तरसेंगे पन्छी,
ताप से आकुल हो जाएंगे प्राण,
दड़ाड़ें पड़ेगी सूखि नदि मे,
और धूल भरि आन्धियाँ चलेंगी शायद.

आंखो मे दिखेगा नीले आकाश का दर्द,
बातों से शब्द कि जगह रेत निकलेंगे,
सूख जाएगी हाथ के कलम कि स्याहि भी,
और पथिक अपना पथ बदल देगा शायद.

साधारण सा इन्सान...

हाँ यह सच है कि मै, एक साधारण सा इन्सान हूँ,
भीड़ मे खो जाने योग्य.

दूर गगन मे चमकता वो अलग सा सितारा नही,
जिसे देखने कि हर किसी को लालसा रहती है,
मै तो किसी कोने मे टिमटिमाता,
भूला भटका,अपनी यादो मे खो जाने वाला तारा हूँ मैं.

जिसके लिये किसी ने रास्ते नही बनाए,
जिसके लिये किसी ने दुआएं नही माँगी,
जिसे किसी ने एक प्यार के नजर से नही देखा,
जिसके सहारे के लिये कोई हाथ आगे नही बढा,
जो अपना सहारा खुद है, जिसने खुद अपनी राहें बनाई है.
जिसके पांव मे चुभते कांटे उसे दर्द का एहसास देते है,
जो खुश है, उन कांटों का साथ पा कर भी,
किसि ने तो साथ दिया,
कल तो ये कांटे भी नही थे,
सिर्फ़ रास्ते का धूल साथ था,
ऐसा ही एक साधारण सा इन्सान हूँ मै.

एक साधारण सी जिंदगी है मेरी,
सपने है आंखो मे, पर उन्हे देख नही सकता,
भावना है मन मे, पर उन्हे कह नही सकता,
करना कुछ चाहता हूँ, दुनिया कुछ चाहती है,
और भीड़ के रंग मे भंग ना हो जाये,
इसलिये गिरने का नही सोचता, उठने का नही सोचता,
रंग जाता हूं भीड़ के रंग मे, चलता रहता हूं उनके साथ,
भीड़ मे खो कर मेरी पहचान भीड़ कि हो जाती है.

बुरी नहि है ये भीड़ भी,
यहाँ पाने को बहुत कुछ है, खोने को कुछ नही,
यहाँ सब कुछ है, जो मुझे चाहिए,
खुशियाँ भी, गम भी, वक़्त भी,
अपने भी, पराये भी,
टूटे बिखड़े सपने, यादो के झरोखे,
भविष्य कि आस, कांटो का दर्द,
स्नेह कि अनुभुति, सब कुछ,
ये सब मुझे एहसास दिलाती है कि,
मै भी एक इन्सान हूँ, भीड़ मे खो जाने योग्य,
मेरी भी एक पहचान है, जो इन्सानों सी है
और भीड़ मे कोई तो होगा,
जो दो-चार क्षण मुझसे बातें करना चाहेगा,
आमन्त्रित हैं वो लोग,जिनके साथ मै फिर भीड़ मे खो सकूं.

एक अपना खो रहा हूँ, दूसरे को पा रहा हूँ...

आज यहाँ खुशी है, गम भी है,
आज मन हँस रहा, आँखे नम भी है,
आज मैने कुछ खोया कुछ पाया भी है,
आज जी भर हँसा, और रोया भी है.

आज मन मे यादें पुरानी, और आँखो मे भविष्य का सपना भी है,
धुऐं का साथ है छुटा, पर काली घटाओं मे एक बादल अपना भी है,
सिर से हट गई है हाथें, हाथों ने हाथ को थामा है,
धूप है आज खिला निख्रड़ा, और धुऐं का कोहड़ा घना है.

आज डूबा है सूरज, पर आज ही चाँद भी उग आया है,
आज घना है जब मन, जीवन ने रंग अपना बिखराया है,
आज थका हूँ जब मै, किसी ने नींद मेरी लूटी है,
आज जब है मदिर आँखे, स्वपन मेरी टूटी है.

आज जब मै हूँ दुखी, तो खुशी मेरी है,
हिम का छूटा है साथ, तो आज सरित मेरी है,
यादें मन मे घुमड़ रही, संक्रमण की ये घड़ी है,
नजरों से खुश हूँ मै, मगर मन मे पीड़ा ये बड़ी है,
किसी से छूटा है साथ, किसी ने अन्जाने चैन लूटा है,
किसी से जुड़ा है रिश्ता, कही यादों का सिलसिला टूटा है.
एक अपना खो रहा हूँ, दूसरे को पा रहा हूँ.