आज है सतरंगी दिवाली, स्नेह से भींगी दिवाली.
दीप हाथो मे पड़े है, बदन पर सब वसन नये है,
तारो के इंतजार मे हूँ, तिमिर के सत्कार मे हूँ,
शायद कभी ऐसा हुआ था, अयोध्या दीपो से सजा था,
आज पुनरावृति उसकी, वनवास से पा राम मुक्ति,
लंका से विजय होकर, और सीता साथ लेकर,
पुनः महलो मे पधारे, प्रजा जनो के भाग्य तारे,
उन क्षणों के याद कि, और कुछ फरियाद कि,
आज है सतरंगी दिवाली, स्नेह से भींगी दिवाली.
सूरज तो अब ढल चुका है, बस किरण कुछ शेष बचा है,
याद आते क्षण वो अब मुझे, जब पिता जी सबसे पहले,
सरकंडो कि थे हुक्का जलाते, और देवो को दिखाते,
फिर आंवले के पेड़ को, अन्जाने मन्त्रो से समझाते,
तब कहि हम नट्खट भोले, कुछ और कि थे अनुमति पाते,
आज वही सतरंगी दिवाली, स्नेह से भींगी दिवाली.
फिर शुरु होत था अनगिन, दियो का कतार कमसिन,
पूजा और मन्त्रोचार सारे, बड़े जनो के प्यार सारे,
पटाको कि अन्गिनत लड़िया, रंग विरंगी छोटी फुल्झड़िया,
माँ मेरी बन संवर कर, पूजा कि थाल आंगन मे धर,
करती थी इंतजार बैठी, पंडित जी के आने तक कि,
हमे भला फ़ुर्सत कहाँ था, पटाको में हि मन रमा था,
आज वही सतरंगी दिवाली, स्नेह से भींगी दिवाली.
फिर हम सब दोस्त सारे, भोले भाले प्यारे प्यारे,
कि निकल पड़ती थी टोली, नाजुक निर्भय वो हमजोली,
गाँव सारा घुमते थे, खुब खुशी से झुमते थे,
गीत जो आते थे थोड़े, गाते थे ले ले हिलोड़े,
अंत मे थक चूर होते, घर लौटने को मजबूर होते,
फिर पता नही नींद मे, कैसे मनती थी दिवाली,
आज वही सतरंगी दिवाली, स्नेह से भींगी दिवाली.
अब कही जब दूर हैं सब, विधि हाथो मजबूर है सब,
स्वप्न से लगते है वो पल, मानो देखा था उन्हें कल,
और ये रात आ पड़ी है, कार्तिक अमावस काली बड़ी है,
बस एक दीपक जल रहा है, आंच नही धीमा पड़ा है,
भीड़ से छुप कर अकेला, खोया सा चंचल वो पगला,
और अपनी ही झीनी लौ से, तस्वीर बनाता झिलमिल सुनहला,
ऊपर धुएं मे उल्झाता, काली लटो का ख्वाब गहरा,
काश उसे कोई बताता, या कि वो फिर समझ पाता,
जब बाति ही नही संग उसके, कब तक जलेगी दीप खाली,
और ख्यालो मे यू हीं, कैसे मनेगी ये दीवली,
नेह से रंगी दिवाली, स्नेह से भींगी दिवाली.

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