Tuesday, November 27, 2007

आदमी या घोड़ा...


बचपन मे एक दिन,
मैने एक तांगा खड़ा देखा,
और उसमे जुता घोड़ा,
सोता हुआ अड़ा देखा.

गले में उसके लटक रहि थी,
एक चने कि छोटी बोरी,
और आंखों पे पट्टी बन्धि थी,
देख सके वो आगे थोड़ी.

कौतूहल बस मै पूछ बैठा,
यार यह जीवन कैसे जिते हो,
दिन भर जुते हुए हो,
फिर भी नहि तनिक खिझे हो.

हंस कर वो मुझ से बोल उठा,
जा खेल कूद दिन थोड़ा है,
मै तो बस तन से घोड़ा हूँ,
आदमी तो मन से घोड़ा है.

सुन कर के उसकि ये बातें,
लगा कि कुछ-कुछ रूठा है,
आदमी से शायद जलता है,
या फिर दिन भर का भूखा है.

बात गई बचपन बीता,
मै शिक्षा पा आस्वस्थ हुआ,
अच्छी जगह में नौकड़ी मिली,
आगे का मार्ग प्रसस्थ हुआ.

फिर कल जब रात्रि भोज पर,
मित्र से जीवन कि परिचर्चा कि,
उसकि बोझो के दुखड़े सुने,
और अपनि दिनचर्या दी.

हंस कर बोला वो मित्र मेरा,
तू आदमी है या घोड़ा है,
नास्ते मे चना, और दिन भर काम,
रंग-रलियो का शौक ना थोड़ा है.

यह सुन कर मेरे अंतर्मन में,
उस घोड़े कि बात उमर आई,
वो तो मजबुरी बस घोड़ा था,
मैनें मन को बस मे कर,
सचमुच घोड़े कि गति पाई.

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