सुविधाओं से भरि दुनिया में, हम बहुत कुछ पाते है,
और अपना अस्तित्व भुला जाते है,
मन मे प्रश्न आता है, कौन हूँ मैं.
यदि मौका मिले तो,
किसी काम-काजि दिनो मे,
मुम्बई जाइये,
और वहां के लोकल ट्रैन का आनंद उठाईये,
उत्तर आप पा जायेंगे शायद.
जीवन अस्थिर अनजाने ही, हो जाता पथ पर मेल कहीं, सीमित पग डग, लम्बी मंज़िल, तय कर लेना कुछ खेल नहीं। दाएँ-बाएँ सुख-दुख चलते, सम्मुख चलता पथ का प्रसाद -- जिस-जिस से पथ पर स्नेह मिला, उस-उस राही को धन्यवाद।
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