कुछ लिखना चाहता था फूलो पर, कभी देखी थी तुम्हारी दिवानगी उनके प्रति,
कैसे बच्चों सी तुम मुग्ध थी उनकी सुंदरता पर,
आंखो मे हिरणी सी चंचलता थी तुम्हारे,
नजरे हर पल कुछ नया ढूंढ रही थी,
उन फूलो के ढेर मे,
कोई नया रंग, कोई नई खुश्बु,
कपोलो से कितने रंग आ-जा रहे थे,
मानो तुम उनके रंग चुरा रही थी,
इतना खुश पहले कभी नही देखा था तुम्हे,
चकित था मै, कभी सोचा नही, समझ नही सका,
कि फूल इतने प्यारे होते है कि,
अपने रंगों से मन की दुनिया रंग सके.
आज जब उन फूलो को देखता हूँ,
तो मन मे एक मीठा सा एहसास होता है,
और दुनिया सिमट जाती है मेरी,
उस एक फूल कि पंखुड़ियों मे,
जो सब से सुंदर है मेरे लिये,
पता नही वो फिर कभी दिखेगी या नही,
पर मन का कोई कोना रंगने से नही बचा है.

No comments:
Post a Comment