दूरी का एहसास है मुझे,जानता हूँ पल पल तुझसे, दूर होता जा रहा हूँ,
अन्जाने शहर के कोलाहलों मे, विश्वास मन का खो रहा हूँ,
भटक रही है ये दिशाए, लड़खड़ाते अब उठते मेरे कदम,
राह लम्बी वीरान सूनी, कहाँ गई मुझे छोड़ कर तुम.
दूरी का एहसास है मुझे,
जानता हूं नदी के किनारे, बिछुड़ कर नहीं फिर एक होते,
सागर के मन को सींचने को, दूरी मे जीवन हैं जिते,
टूटता मन का किनारा, पड़ने लगी है सांसे अब कम,
राह लम्बी वीरान सूनी, कहाँ गई मुझे छोड़ कर तुम.
दूरी का एहसास है मुझे,
जानता हूं चंदा कि दूरी, सच मे धरा से दूर है वह,
पर देखो ना विश्वास उसका, जाए कहाँ मजबुर है वह,
मन मेरा क्यो यों डर रहा है, दूर ना हो जाओ कही तुम,
राह लम्बी वीरान सूनी, कहाँ गई मुझे छोड़ कर तुम.
दूरी का एहसास है मुझे,
दूरी का एहसास है मुझे,
जानता हूँ चक्र समय का, हर क्षण बढता जा रहा है,
टूटेगा कब मौन हिम सा, असहाय पथिक पथ मे खड़ा है,
अवसाद का हिम जमा मन पर, इंतजार मे है आंखे ये नम,
राह लम्बी वीरान सूनी, कहाँ गई मुझे छोड़ कर तुम.
दूरी का एहसास है मुझे,
समझ सको तो समझो तुम इसे, सब प्रयास कर थक सा गया हूँ,
मानता हूँ भूल हुई मुझसे, पर जख्म भी हर पल सहा हूँ,
दर्द विश्वास के यो टूटने का, क्या तुम मुझसी सह सकोगी,
और यादो के सहारे, कब तक जिंदा रह सकोगी,
तोड़ दो अवसाद मन का, व्यर्थ उनमे घुलती रही हो,
सच झूठ के आडंबरों मे, युगो से तो जलती रही हो,
एक झूठ यदि बोल कर मै, कुछ पल तुझको पा सकूँगा,
सच कहूँ तो सच समझना, जीवन भर झूठा रहूँगा,
कलम अब रूकने लगा है , पड़ने लगे हैं शब्द अब कम,
राह लम्बी वीरान सूनी, कहाँ गई मुझे छोड़ कर तुम,
स्नेह का दीपक जला है, मत जाओ ना मुँह मोड़ कर तुम.

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