Tuesday, November 27, 2007

साधारण सा इन्सान...

हाँ यह सच है कि मै, एक साधारण सा इन्सान हूँ,
भीड़ मे खो जाने योग्य.

दूर गगन मे चमकता वो अलग सा सितारा नही,
जिसे देखने कि हर किसी को लालसा रहती है,
मै तो किसी कोने मे टिमटिमाता,
भूला भटका,अपनी यादो मे खो जाने वाला तारा हूँ मैं.

जिसके लिये किसी ने रास्ते नही बनाए,
जिसके लिये किसी ने दुआएं नही माँगी,
जिसे किसी ने एक प्यार के नजर से नही देखा,
जिसके सहारे के लिये कोई हाथ आगे नही बढा,
जो अपना सहारा खुद है, जिसने खुद अपनी राहें बनाई है.
जिसके पांव मे चुभते कांटे उसे दर्द का एहसास देते है,
जो खुश है, उन कांटों का साथ पा कर भी,
किसि ने तो साथ दिया,
कल तो ये कांटे भी नही थे,
सिर्फ़ रास्ते का धूल साथ था,
ऐसा ही एक साधारण सा इन्सान हूँ मै.

एक साधारण सी जिंदगी है मेरी,
सपने है आंखो मे, पर उन्हे देख नही सकता,
भावना है मन मे, पर उन्हे कह नही सकता,
करना कुछ चाहता हूँ, दुनिया कुछ चाहती है,
और भीड़ के रंग मे भंग ना हो जाये,
इसलिये गिरने का नही सोचता, उठने का नही सोचता,
रंग जाता हूं भीड़ के रंग मे, चलता रहता हूं उनके साथ,
भीड़ मे खो कर मेरी पहचान भीड़ कि हो जाती है.

बुरी नहि है ये भीड़ भी,
यहाँ पाने को बहुत कुछ है, खोने को कुछ नही,
यहाँ सब कुछ है, जो मुझे चाहिए,
खुशियाँ भी, गम भी, वक़्त भी,
अपने भी, पराये भी,
टूटे बिखड़े सपने, यादो के झरोखे,
भविष्य कि आस, कांटो का दर्द,
स्नेह कि अनुभुति, सब कुछ,
ये सब मुझे एहसास दिलाती है कि,
मै भी एक इन्सान हूँ, भीड़ मे खो जाने योग्य,
मेरी भी एक पहचान है, जो इन्सानों सी है
और भीड़ मे कोई तो होगा,
जो दो-चार क्षण मुझसे बातें करना चाहेगा,
आमन्त्रित हैं वो लोग,जिनके साथ मै फिर भीड़ मे खो सकूं.

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