मै अमावस में चंदा को ढूंढता हूँ,काले घने अन्धेरे आकाश के बीच,
टिमटिमाते तारो के लुकझुक प्रकाश के बीच,
भेड़ो के भीड़ से बाद्लो के प्रवाहो के बीच,
अर्ध रात्रि की निरव हवाओ के बीच,
मुझे विश्वास है कि चंदा जरूर दिखेगी.
मै पतझड़ मे फूलों को ढूंढता हूँ,
सूखे पत्तो भरे तनाओ के बीच,
वसंती मद भरी हवाओ के बीच,
पल पल बदलते स्वरूपो के संगम के बीच,
हरित्मा मन मे समेटे कपोलो के आगमन के बीच,
मुझे विश्वास है कि फूल जरूर खिलेंगे.
मै मैदानो मे पर्वतो को ढूंढता हूँ,
अनंत तक दिखती जमी कि दुरियो के बीच,
फासलो मे घुट्ती मिलन कि मजबुरियो के बीच,
गगन से मिलने को आकुल उठते किनारो के बीच,
बाद्लो के प्यार को ब्याकुल, व्यारो के बीच,
मुझे विश्वास है कि पर्वत जरूर दिखेंगे.
मै रेगिस्तान मे नदियो को ढूंढता हूँ,
सूरज कि तपिष मे जलते अरमानों के बीच,
रेतिली आंधी और धूल भरे तूफ़ानों के बीच,
मृगमारीचिका के आशा भरे स्वप्नो के बीच,
कंटीले कैक्ट्स और बबूल जैसे अपनो के बीच,
मुझे विश्वास है कि नदिया कही तो होंगी.
मै तूफ़ानो मे सूरज को ढूंढता हूँ,
बबंडरों सी घुमती अक्खड़ हवाओ के बीच,
जन जीवन को झंझोड़ती प्रचंड प्रवाहो के बीच,
प्रकृती के इन अनूठे पराक्रमों के बीच,
मानवीय मान्यता और विभ्रमो के बीच,
मुझे विश्वास है कि सूरज कि किरणे कभी तो पहूंचेंगी.
मै तुम्हारी यादों मे तुम्हे ढूंढता हूँ,
फासलो और सूने मन कि दूरियो के बीच,
कुछ ना कह सकने कि मजबुरियो के बीच,
भूत कि लम्बी घनी परछाइयों के बीच,
भविष्य के सपने समेटे रुश्वाईयो के बीच,
मुझे विश्वास है कि तुम आज भी वहाँ होगी.
सच कहूँ, तो जानता हूं झूठ है सब,
सच सुनोगी तो सुनो, जो लिख रहा हूँ अब,
पत्झड़ मे नहीं कभी फूल हैं खिलते,
तूफ़ानों मे नहीं कभी सूरज हैं उगते,
रेगिस्तानों मे नहीं नदियां हैं होती,
अमावस की रातों मे नहीं चंदा हैं दिखती,
पर फिर भी तुम्हारी यादों मे तुम ही सिमटी हो,
जज्बातो भरे फैसलों से मुझसे रूठी हो,
स्नेह कि सच्चाईयों से दूर जाती हो,
विश्वास कि गहराईयों को आजमाती हो,
मै फूल, चंदा, नदियों मे तुम्हे ही तो ढूंढता हूं,
वापस फिर कब आओगी, ये सब से पूछता हूं,
फासलों को विश्वास से तोड़ मै दूंगा,
यादों के झरोखे से तूझे ढूंढ मै लूंगा.

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