तुमने ही माँगा था रब से,हर दिन के दो पल मेरे हित मे,
मन कहता कि फिर तुझसे पूछूँ,
क्य पाऊंगा कभी उन्हे जीवन मे.
तुम मौन भले ही रह लेना,
छुपा लेना मन कि वीणा के स्वर,
बस दो पल मुझको दे दो ना,
पा जाऊँगा उसमे सारा उत्तर.
विश्वास यदि नहि हो मुझपर,
तो तुम सहर्ष प्रतिकार करो,
दो पल कि बात तो दूर रही,
पत्रोत्तर से इन्कार करो.
बस दो बाते रह जाएगी मन मे,
तेरा स्नेह कहां मैने खोया,
एक झूठ जो सच का दर्पण था,
उसने बीज जहर का कैसे बोया.

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