रात हो चुकी बहुत प्रिय,अब तनिक मुझे सो लेने दो,
निन्द भरि ये बोझिल पलकें,
इन पलको को मिलने तो दो.
जैसे जीवन मे स्नेह सर्वस्व,
वो गति काया संग निद्रा की है,
इस निर्मम संसार से दूर,
सपनों से सुहाने तंद्रा की है.
वो भी है एक संसार अलग,
जिसमें मै हू और बस तुम हो,
कभी रूठ्ती कभी मानती,
कभी खुशी कभी गुमसुम हो.
उसमें तुम भोली छल दंभ रहित,
नाजुक नकचढी कली सी हो,
पर क्या सच मे लगता है तुझे,
तुम इतनी सीधी भली सी हो.
अरे रूठो मत, छोड़ो भी,
ये मै क्या लिखने बैठ गया,
तेरे नाजुक मन को दुख देकर,
मै कविता करने बैठ गया.
पगली ये शब्द नही है रे,
तेरे यादों के कुछ झोके है,
तू दूर छिपी नीले नभ मे,
और जंजीरों ने मुझे रोके है.
पर मन के अन्दर जो दुनिया है,
उसमे बस तू, तेरी यादें हैं,
सदेह प्रिये तू कही रहे,
पर मन मे गुथी पथिक कि है.
बस बिदा प्रिये इस जग से अब,
चल सपनो के आँगन मे मिलते है,
जहाँ रात्रि के निड़वता मे,
आकुल ह्रिदय के फूल खिलते है.
जैसे जीवन मे स्नेह सर्वस्व,
वो गति काया संग निद्रा की है,
इस निर्मम संसार से दूर,
सपनों से सुहाने तंद्रा की है.
वो भी है एक संसार अलग,
जिसमें मै हू और बस तुम हो,
कभी रूठ्ती कभी मानती,
कभी खुशी कभी गुमसुम हो.
उसमें तुम भोली छल दंभ रहित,
नाजुक नकचढी कली सी हो,
पर क्या सच मे लगता है तुझे,
तुम इतनी सीधी भली सी हो.
अरे रूठो मत, छोड़ो भी,
ये मै क्या लिखने बैठ गया,
तेरे नाजुक मन को दुख देकर,
मै कविता करने बैठ गया.
पगली ये शब्द नही है रे,
तेरे यादों के कुछ झोके है,
तू दूर छिपी नीले नभ मे,
और जंजीरों ने मुझे रोके है.
पर मन के अन्दर जो दुनिया है,
उसमे बस तू, तेरी यादें हैं,
सदेह प्रिये तू कही रहे,
पर मन मे गुथी पथिक कि है.
बस बिदा प्रिये इस जग से अब,
चल सपनो के आँगन मे मिलते है,
जहाँ रात्रि के निड़वता मे,
आकुल ह्रिदय के फूल खिलते है.

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