Tuesday, November 27, 2007

शायद!...

साफ़ है आकाश सुनापन समेटे,
लगता नहि फिर कभी बारिष होगी यहाँ,
नहि छाएंगि कालि घटाएँ फिर से,
और बिजलियाँ भि नहि छिटकेगी शायद.

रस विहिन हो जायेंगी धरा,
मुर्झा जयेंगे हरे-भरे पौधे,
सूख जाएंगी उनकि टहनियां भी,
और खजूर के कंटीले पेड़ उगेंगे शायद.

प्यास से व्याकुल तरसेंगे पन्छी,
ताप से आकुल हो जाएंगे प्राण,
दड़ाड़ें पड़ेगी सूखि नदि मे,
और धूल भरि आन्धियाँ चलेंगी शायद.

आंखो मे दिखेगा नीले आकाश का दर्द,
बातों से शब्द कि जगह रेत निकलेंगे,
सूख जाएगी हाथ के कलम कि स्याहि भी,
और पथिक अपना पथ बदल देगा शायद.

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