Wednesday, November 28, 2007

मेरी राधा...

जैसे केशव की राधा थी,
वैसी हीं मेरी राधा है.

वह मुर्तिमयि वह प्रेमरूप,
वह शशि समान उज्ज्वल स्वरूप,
वह कांतिमयि वह ह्रिदय वत्सल,
वह स्नेह स्वरूप चंचल निश्चल.

नख से शिख तक वो चन्द्र प्रभा,
देती रजनी को भी आभा,
वह मादक मुरली के मधुर धुन सी,
मै प्रिय वो मेरी प्रेयसी.

मै चातक हूँ, वह है चकोर,
दीपक पर ज्यो किटो का जोर,
वह प्रेम सुधा वर्षाति है,
आकुल ह्रिदय को भर्माति है.

चन्दन समान वो है शीतल,
कुन्दन समान वो बीच अनल,
वाणी से सुधा लुताती वो,
मन उसका जैसे गंगाजल.

उसने है पथिक को प्राण दिया,
उसने है ह्रिदय को गाण दिया,
उससे जीवन को लक्ष्य मिला,
राही को मंजिल का साक्ष्य मिला.

वह यो ही मनमोहक व्यार रहे,
सपनो कि स्वछंद बहार रहे,
दुख हो ना तुझे कभी भी तनिक,
हर पथ पर बिछा पाये पुष्प पथिक.

तू राधा ओ मेरी राधा,
मै केशव नही तनिक भी सा.

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