Wednesday, November 28, 2007

आतुर आकांक्षा...

यह रोग है क्या होता है क्यो,
अब तक ना उसने जाना था,
इशारों पर हिलता था इन्द्रासन,
मर्त्य नर का कहा ठिकाना था.

देवों का क्या वह सम्मान करे,
जब देवेन्द्र स्वयं थर्ड़ाते थे,
आने वाली हर विपदा में,
नंगे पॉव तो दौड़े आते थे.

स्वर्ग का सुन्दर रंग महल,
जिसके रूप राग मे डूबा था,
श्रिष्टी की थी वो अनुपम किर्ति,
रूप गुण दोनो ही अजूबा था.

सौ जन्म तपस्या कर भी ऋषि,
सौभाग्य समझते जिसके दर्शन मे,
उस पत्थर ह्रिदय मे यह पीड़ा,
क्यो उठी आज यों क्षण भर मे.

मन मे कैसे उमड़ रहे विचार,
ज्यों मंथन सागर का होता है,
करने को अपना सर्वस्व न्योछावर,
क्यो तड़प तड़प मन रोता है.

बस खोना चाहे अपना सर्वस्व,
नहि दूजी कोई अभिलाशा मन में,
ये लपटे क्यों तन को जला रही,
आती ये कहॉ से अंतर्मन में.

वह एक नजर ले गई उसे,
ना जाने किस अद्भुत अंजाने में,
जीवन जिसने देवी का जिया,
आतुर थी दासी बन जाने में.

उर्वशी कि इन आतुर आकांक्षा को,
अर्जुन अनभिज्ञ ना जान सका,
आर्ये कि है कुछ ऐसी गति,
मन उसका यह ना मान सका.

नजरों में भरा सम्मान मातृत्व का,
पग रज लेने ज्यों आगे बढा,
जीवन गति के यों अनादर का,
तत्क्षण उसको अभिशाप लगा.

बोली उर्वशी हे वीर धनुर्धर,
जैसे मुझे अपमान तेरा सहना होगा,
जीवन मे तुझे भी कभी ना कभी,
वृहण्ला बन बर्षों रहना होगा.

नारी मन का यों घोर अनादर,
आज तक ना किसी ने जाना होगा,
क्या यही है पुरुषोचित् कर्म तेरा,
किस विधि अब मुझे लुट जाना होगा.

क्या नही है मुझमें अद्भुत सौंदर्य,
फिर क्यों तुमने मुझे ठुकराया,
चिर यौवन कंचन रूप मेरा,
अक्ष्क्षुण अतुलनिय है काया.

नजरो की पैनी धार से तो,
खुद स्वर्गाधिपति भी डरते है,
महर्षि और ब्रम्हर्षि भी,
तप छोड़ कर आहे भरते है.

फिर तुम तो नहीं पत्नीव्रता,
ज्यो द्रौपदी संग सुभद्रा जीति है,
पा जाती मै भी एक ठौर वहॉ,
नही कम किसी से भी मेरी प्रीति है.

उस देवी कि ऐसी बाते सुन,
अर्जुन का जैसे सपना टूटा,
किस मुँह से अब क्या बात करे,
क्या भाव ह्रदय का है झूठा.

आवेग मे अंधी रमणी को,
अब मुझे सब समझाना होगा,
कैसे था यह पुत्रोचित् कर्म मेरा,
नरोचित् मर्यादा बतलाना होगा.

पाते है स्नेह विरल जग में,
यह सच है सब ने माना है,
पर लुट जाना उस के आवेग मे ही,
यह नहीं धर्म का बाना है.

नर और नारी के जीवन में,
प्रणय से भी बढ कर कुछ रिश्ते है,
कर्तव्य कि होती तब प्राकष्ठा,
जब माँ के रुधिर से शिशु सींचते है.

उस मातृत्व के अनुपम बंधन से,
बढ कर दूजा कोई ड़ोर नही,
सौ जन्म समर्पित है उस पर,
तुझ से मेरा है नेह वही.

हैं देवेन्द्र हमारे पितृ तुल्य,
तुम उनके प्रासाद कि मलिका हो,
सौंदर्य पर जिसके मुझे है गौरव,
हा द्रौपदी नहि तुम देविका हो.

सोचो आर्ये किस भाँति भला फिर,
तुझसे मैं प्रणय की आशा करता,
जिसको पूजा है जीवन भर,
उस कलश मे जहर कैसे भरता.

फिर माते तेरी यह प्रीति,
यदि ह्रदय से उपजी सच्ची प्रीति है,
तो तेरा यह श्राप भी मेरे हित,
अमृत से बड़ी विभूति है.

तेरे मन का यह स्नेह यदि,
रूप बदल मुझे मिल पाये,
सौभाग्य समझूं उस जीवन को,
माता जो तुझ जैसा पाए.

सुन कर अर्जुन कि सब बातें,
उर्वशी का मन फिर भर आया,
आंखो के कोर में अश्रु लिये बोलि,
अर्जुन तुने मुझे हत् भागिनि बनाया.

यदि सच में यह बस प्रिति मेरी,
ना पड़े कभी तुम पर मेरी छाया,
जा पाना चाहे तू जिस रूप मुझे,
वैसी ही दिखे तुझे मेरी काया.

पर समझ ना सकी उस आतुरता को,
जिसके हठ यह सब ठाना था,
श्रृष्टिकर्ता भी जिसे समझ ना सके,
उस देवी का कहॉ ठिकाना था.

अपना सर्वस्व समर्पण भी,
यदि गृहित कर्म है लिप्सा है,
फिर क्यो कहलाता प्रेम अमर,
प्रणय भाव यदि पातक्ता है.

था सच पर अर्जुन या दोष उसका,
मन सोच कर बरबस रोता था,
जीने की बांकि बची चाह नही,
नयन आंसू का अविरल सोता था.

1 comment:

Unknown said...

ati sundar varnan.....
Sabdo ka abhav pratit ho raha hai aapki kavita ki sundarta prakat karne mein....