दूर हूं मै बहुत तुमसे, पल पल मन में जल रहा हूँ, सच्चाईयों से टूटता हूं, इंसानी सांचे मे अब ढल रहा हूँ,
आदर्श और संघर्ष मे ही, खो गया है होश मेरा,
आज फिर याद आ रहा है, आंचल मे सिमटा प्यार तेरा.
मानता हूं भाग्य ने सुख भी दिया है, पर छला है,
अभिमान भरि अट्टालिका से, गॉव का छप्पड़ भला है,
बह रहा है आज चहुँ ओर, मन मे सिमटा विश्वास मेरा,
आज फिर याद आ रहा है, आंचल मे सिमटा प्यार तेरा.
ढूंढता एक नजर तुझसा, पर नही कोई तेरे कण सा बना है,
मारीचिका के बुलबुले में, बस चुभन है या दगा है,
क्यों किया मुझे दूर खुदसे, छिन गया सारा स्वपन मेरा,
आज फिर याद आ रहा है, आंचल मे सिमटा प्यार तेरा.
जननी है तू जानकी है, बात मन के जानती है,
कौन हूं, क्या चाहता हूं, मुझसे अधिक पहचानती है,
बिश्वास के उस डोर से, अब भी बंधा हर श्वांस मेरा,
आज फिर याद आ रहा है, आंचल मे सिमटा प्यार तेरा.
रख ले यह शीश गोद मे अब, जिसमें कभी मैं सिमटा पड़ा था,
खो जाऊँ फिर उस आशिया में, जहाँ से यह अंकुर आगे बढा था,
आज भी महसूस करता, हर आहट पर एहसास तेरा,
मॉ फिर याद आ रहा है, आंचल मे सिमटा प्यार तेरा.

3 comments:
bhut he bejode hai apki rachna...
माँ के लिये इतनी भावपूर्ण रचना बडे दिनों बाद पढी।
सुंदर रचना के लिये बधाई ।
bahut achchi lagi mujhe aapki ye kavita....
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